नींद और सपनों के अज़कार

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بِاسْمِكَ رَبِّي وَضَعْتُ جَنْبِي ، وَبِكَ أَرْفَعُهُ، فَإِنْ أَمْسَكْتَ نَفْسِي فَارْحَمْهَا ، وَإِنْ أَرْسَلْتَهَا فَاحْفَظْهَا بِمَا تَحْفَظُ بِهِ عِبَادَكَ الصَّالِحِينَ.
ऐ मेरे पालनहार, तेरे नाम से मैंने अपनी करवट रखी और तेरी सहायता से उसे उठाता हूँ। यदि तू मेरी आत्मा को रोक ले तो उस पर दया कर, और यदि उसे वापस भेजे तो उसकी रक्षा कर जैसे तू अपने नेक बंदों की रक्षा करता है।
اللَّهُمَّ إِنَّكَ خَلَقْتَ نَفْسِي وَأَنْتَ تَوَفَّاهَا لَكَ مَمَاتُهَا وَمَحْيَاهَا ، إِنْ أَحْيَيْتَهَا فَاحْفَظْهَا ، وَإِنْ أَمَتَّهَا فَاغْفِرْ لَهَا . اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ الْعَافِيَةَ.
ऐ अल्लाह, तूने मेरी आत्मा बनाई और तू ही उसे मृत्यु देता है। उसकी मृत्यु और जीवन तेरे ही अधिकार में हैं। यदि तू उसे जीवित रखे तो उसकी रक्षा कर और यदि उसे मृत्यु दे तो उसे क्षमा कर। ऐ अल्लाह, मैं तुझसे कल्याण माँगता हूँ।
اللَّهُمَّ قِنِي عَذَابَكَ يَوْمَ تَبْعَثُ عِبَادَكَ.
ऐ अल्लाह! जिस दिन तू अपने बंदों को उठाएगा, उस दिन मुझे अपनी यातना से बचा।
بِاسْمِكَ اللَّهُمَّ أَمُوتُ وَأَحْيَا.
ऐ अल्लाह! तेरे नाम से मैं मरता हूँ और जीता हूँ।
الْحَمْدُ لِلَّهِ الَّذِي أَطْعَمَنَا وَسَقَانَا، وَكَفَانَا، وَآوَانَا، فَكَمْ مِمَّنْ لَا كَافِيَ لَهُ وَلَا مُؤْوِيَ.
सारी प्रशंसा अल्लाह के लिए है जिसने हमें खिलाया, पिलाया, हमारी ज़रूरत पूरी की और हमें आश्रय दिया। कितने ही लोग हैं जिनकी ज़रूरत पूरी करने वाला और आश्रय देने वाला कोई नहीं।
اللَّهُمَّ عَالِمَ الْغَيْبِ وَالشَّهَادَةِ فَاطِرَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ رَبَّ كُلِّ شَيْءٍ وَمَلِيكَهُ، أَشْهَدُ أَنْ لَا إِلَهَ إِلَّا أَنْتَ، أَعُوذُ بِكَ مِنْ شَرِّ نَفْسِي، وَمِنْ شَرِّ الشَّيْطَانِ وَشِرْكِهِ، وَأَنْ أَقْتَرِفَ عَلَى نَفْسِي سُوءًا أَوْ أَجُرَّهُ إِلَى مُسْلِمٍ .
ऐ अल्लाह, छिपे और प्रकट को जानने वाले, आकाशों और धरती के रचयिता, हर चीज़ के पालनहार और स्वामी, मैं गवाही देता हूँ कि तेरे सिवा कोई सच्चा पूज्य नहीं। मैं अपने मन की बुराई, शैतान की बुराई और उसके शिर्क से, तथा स्वयं अपने ऊपर कोई बुराई करने या उसे किसी मुसलमान तक पहुँचाने से तेरी शरण माँगता हूँ।
اللَّهُمَّ أَسْلَمْتُ نَفْسِي إِلَيْكَ، وَفَوَّضْتُ أَمْرِي إِلَيْكَ، وَوَجَّهْتُ وَجْهِي إِلَيْكَ، وَأَلْجَأْتُ ظَهْرِي إِلَيْكَ، رَغْبَةً وَرَهْبَةً إِلَيْكَ، لَا مَلْجَأَ وَلَا مَنْجَا مِنْكَ إِلَّا إِلَيْكَ، آمَنْتُ بِكِتَابِكَ الَّذِي أَنْزَلْتَ وَبِنَبِيِّكَ الَّذِي أَرْسَلْتَ.
ऐ अल्लाह, मैंने स्वयं को तेरे सुपुर्द किया, अपना मामला तुझे सौंपा, अपना चेहरा तेरी ओर किया और आशा तथा भय के साथ अपनी पीठ का सहारा तुझे बनाया। तुझसे बचने का कोई आश्रय या मुक्ति नहीं सिवाय तेरी ओर आने के। मैं तेरी उतारी हुई किताब और तेरे भेजे हुए नबी पर ईमान लाया।
سُبْحَانَ اللَّهِ.
अल्लाह पवित्र है।
الْحَمْدُ لِلَّهِ.
सारी प्रशंसा अल्लाह के लिए है।
اللَّهُ أَكْبَرُ.
अल्लाह सबसे महान है।
يَجْمَعُ كَفَّيْهِ ثُمَّ يَنْفُثُ فِيهِمَا وَالْقِرَاءَةُ فِيهِمَا: {قُلْ هُوَ اللَّهُ أَحَدٌ} وَ{قُلْ أَعُوذُ بِرَبِّ الْفَلَقِ} وَ{قُلْ أَعُوذُ بِرَبِّ النَّاسِ} وَمَسْحُ مَا اسْتَطَاعَ مِنَ الْجَسَدِ يَبْدَأُ بِهِمَا عَلَى رَأْسِهِ وَوَجْهِهِ وَمَا أَقْبَلَ مِنْ جَسَدِهِ.
दोनों हथेलियों को मिलाकर उनमें फूँकें और पढ़ें: कहो, अल्लाह एक है; कहो, मैं सुबह के प्रभु की शरण माँगता हूँ; और कहो, मैं लोगों के प्रभु की शरण माँगता हूँ। फिर दोनों हथेलियों से शरीर के जितने भाग तक पहुँच सकें फेरें, सिर, चेहरे और शरीर के सामने के भाग से आरंभ करें।
سُورَةُ الْبَقَرَةِ: أَعُوذُ بِاللَّهِ مِنَ الشَّيْطَانِ الرَّجِيمِ
آمَنَ الرَّسُولُ بِمَا أُنزِلَ إِلَيْهِ مِن رَّبِّهِ وَالْمُؤْمِنُونَ ۚ كُلٌّ آمَنَ بِاللَّهِ وَمَلَائِكَتِهِ وَكُتُبِهِ وَرُسُلِهِ لَا نُفَرِّقُ بَيْنَ أَحَدٍ مِّن رُّسُلِهِ ۚ وَقَالُوا سَمِعْنَا وَأَطَعْنَا ۖ غُفْرَانَكَ رَبَّنَا وَإِلَيْكَ الْمَصِيرُ. لَا يُكَلِّفُ اللَّهُ نَفْسًا إِلَّا وُسْعَهَا ۚ لَهَا مَا كَسَبَتْ وَعَلَيْهَا مَا اكْتَسَبَتْ ۗ رَبَّنَا لَا تُؤَاخِذْنَا إِن نَّسِينَا أَوْ أَخْطَأْنَا ۚ رَبَّنَا وَلَا تَحْمِلْ عَلَيْنَا إِصْرًا كَمَا حَمَلْتَهُ عَلَى الَّذِينَ مِن قَبْلِنَا ۚ رَبَّنَا وَلَا تُحَمِّلْنَا مَا لَا طَاقَةَ لَنَا بِهِ ۖ وَاعْفُ عَنَّا وَاغْفِرْ لَنَا وَارْحَمْنَا ۚ أَنتَ مَوْلَانَا فَانصُرْنَا عَلَى الْقَوْمِ الْكَافِرِينَ. [الْبَقَرَةُ 285 - 286]
सुरह अल-बक़रा: मैं धिक्कारे हुए शैतान से अल्लाह की शरण माँगता हूँ
रसूल उस पर ईमान लाए जो उनके रब की ओर से उन पर उतारा गया और ईमान वाले भी। सब अल्लाह, उसके फ़रिश्तों, उसकी किताबों और उसके रसूलों पर ईमान लाए। हम उसके रसूलों में किसी के बीच भेद नहीं करते। उन्होंने कहा: हमने सुना और आज्ञा मानी। हमारे रब, हम तेरी क्षमा चाहते हैं और तेरी ही ओर लौटना है। अल्लाह किसी प्राण पर उसकी सामर्थ्य से अधिक बोझ नहीं डालता। उसने जो भलाई कमाई वह उसके लिए है और जो बुराई कमाई उसका भार उसी पर है। हमारे रब, यदि हम भूल जाएँ या गलती करें तो हमें न पकड़। हमारे रब, हम पर वैसा बोझ न डाल जैसा तूने हमसे पहले लोगों पर डाला था। हमारे रब, हम पर वह बोझ न डाल जिसकी हमें शक्ति नहीं। हमें माफ़ कर, हमें क्षमा कर और हम पर दया कर। तू ही हमारा संरक्षक है, इसलिए इनकार करने वाले लोगों के विरुद्ध हमारी सहायता कर। [अल-बक़रा 2:285–286]
مَنْ قَرَأَ آيَتَيْنِ مِنْ آخِرِ سُورَةِ الْبَقَرَةِ فِي لَيْلَةٍ كَفَتَاهُ.
जो रात में सुरह अल-बक़रा की अंतिम दो आयतें पढ़े, वे उसके लिए पर्याप्त होंगी।
آيَةُ الْكُرْسِيِّ: أَعُوذُ بِاللَّهِ مِنَ الشَّيْطَانِ الرَّجِيمِ
اللَّهُ لَا إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ الْحَيُّ الْقَيُّومُ ۚ لَا تَأْخُذُهُ سِنَةٌ وَلَا نَوْمٌ ۚ لَّهُ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ ۗ مَن ذَا الَّذِي يَشْفَعُ عِندَهُ إِلَّا بِإِذْنِهِ ۚ يَعْلَمُ مَا بَيْنَ أَيْدِيهِمْ وَمَا خَلْفَهُمْ ۖ وَلَا يُحِيطُونَ بِشَيْءٍ مِّنْ عِلْمِهِ إِلَّا بِمَا شَاءَ ۚ وَسِعَ كُرْسِيُّهُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ ۖ وَلَا يَئُودُهُ حِفْظُهُمَا ۚ وَهُوَ الْعَلِيُّ الْعَظِيمُ. [الْبَقَرَةُ 255]
आयतुल कुर्सी: मैं धिक्कारे हुए शैतान से अल्लाह की शरण माँगता हूँ
अल्लाह, उसके सिवा कोई इबादत के योग्य नहीं; वह सदा जीवित है, सबको संभालने वाला है। उसे न ऊँघ आती है न नींद। आकाशों और धरती में जो कुछ है सब उसी का है। कौन है जो उसकी अनुमति के बिना उसके पास सिफ़ारिश करे? वह जानता है जो उनके सामने है और जो उनके पीछे है; वे उसके ज्ञान में से किसी चीज़ को नहीं घेर सकते सिवाय उसके जो वह चाहे। उसकी कुर्सी आकाशों और धरती पर विस्तृत है और उन दोनों की रक्षा उसे नहीं थकाती। वह सर्वोच्च, महान है। [आयतुल कुर्सी, अल-बक़रा 2:255]
أُجِيرَ مِنَ الْجِنِّ حَتَّى يُصْبِحَ.
सुबह होने तक जिन्नों से सुरक्षा मिलेगी।
أَذْكَارُ مَنْ قَلِقَ فِي فِرَاشِهِ وَلَمْ يَنَمْ
عَنْ بُرَيْدَةَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ، قَالَ: شَكَا خَالِدُ بْنُ الْوَلِيدِ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ إِلَى النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فَقَالَ: يَا رَسُولَ اللَّهِ! مَا أَنَامُ اللَّيْلَ مِنَ الْأَرَقِ، فَقَالَ النَّبِيُّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: "إِذَا أَوَيْتَ إِلَى فِرَاشِكَ فَقُلْ: اللَّهُمَّ رَبَّ السَّمَاوَاتِ السَّبْعِ وَمَا أَظَلَّتْ، وَرَبَّ الْأَرَضِينَ وَمَا أَقَلَّتْ، وَرَبَّ الشَّيَاطِينِ وَمَا أَضَلَّتْ، كُنْ لِي جَارًا مِنْ خَلْقِكَ كُلِّهِمْ جَمِيعًا أَنْ يَفْرُطَ عَلَيَّ أَحَدٌ مِنْهُمْ أَوْ أَنْ يَبْغِيَ عَلَيَّ، عَزَّ جَارُكَ، وَجَلَّ ثَنَاؤُكَ وَلَا إِلَهَ غَيْرُكَ، وَلَا إِلَهَ إِلَّا أَنْتَ"

عَنْ عَمْرِو بْنِ شُعَيْبٍ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ جَدِّهِ: أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ كَانَ يُعَلِّمُهُمْ مِنَ الْفَزَعِ كَلِمَاتٍ: "أَعُوذُ بِكَلِمَاتِ اللَّهِ التَّامَّةِ مِنْ غَضَبِهِ وَشَرِّ عِبَادِهِ، وَمِنْ هَمَزَاتِ الشَّيَاطِينِ وَأَنْ يَحْضُرُونِ"
बिस्तर पर बेचैनी और नींद न आने पर अज़कार
बुरैदा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि ख़ालिद बिन वलीद रज़ियल्लाहु अन्हु ने नबी, उन पर अल्लाह की दया और सलामती हो, से शिकायत की: ऐ अल्लाह के रसूल, अनिद्रा के कारण मुझे रात को नींद नहीं आती। नबी ने कहा: जब तुम बिस्तर पर जाओ तो कहो: ऐ अल्लाह, सात आकाशों और उनके नीचे की चीज़ों के रब, धरतियों और उन पर रखी चीज़ों के रब, शैतानों और उनके भटकाए लोगों के रब, अपनी सारी सृष्टि से मेरे रक्षक बन कि उनमें से कोई मुझ पर ज़्यादती या अत्याचार न करे। तेरा संरक्षण महान है, तेरी प्रशंसा महान है, तेरे सिवा कोई उपास्य नहीं और तेरे सिवा कोई इबादत के योग्य नहीं।

अम्र बिन शुऐब अपने पिता से और वे अपने दादा से वर्णन करते हैं कि अल्लाह के रसूल, उन पर दया और सलामती हो, भय के समय उन्हें ये शब्द सिखाते थे: मैं अल्लाह के संपूर्ण वचनों की शरण माँगता हूँ उसके क्रोध और उसके बंदों की बुराई से, शैतानों के उकसावे से और उनके मेरे पास आने से।
أَذْكَارُ الْأَحْلَامِ
عَنْ أَبِي قَتَادَةَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: "الرُّؤْيَا الصَّالِحَةُ" وَفِي رِوَايَةٍ "الرُّؤْيَا الْحَسَنَةُ مِنَ اللَّهِ، وَالْحُلْمُ مِنَ الشَّيْطَانِ، فَمَنْ رَأَى شَيْئًا يَكْرَهُهُ فَلْيَنْفُثْ عَنْ شِمَالِهِ ثَلَاثًا وَلْيَتَعَوَّذْ مِنَ الشَّيْطَانِ، فَإِنَّهَا لَا تَضُرُّهُ".
सपनों से संबंधित अज़कार
अबू क़तादा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल, उन पर दया और सलामती हो, ने कहा: नेक सपना, और एक रिवायत में अच्छा सपना, अल्लाह की ओर से है और बुरा सपना शैतान की ओर से है। जो कोई अप्रिय सपना देखे वह अपनी बाईं ओर तीन बार हल्की फूँक मारे और शैतान से अल्लाह की शरण माँगे; वह सपना उसे नुकसान नहीं पहुँचाएगा।
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हदीस पुस्तकालय से

हदीस
Abu Sa'id reported that Abu Musa al-Ash'ari came to the door of 'Umar and sought his permission (to get into his house). Umar said: That is once. He again sought permission for the second time and 'Umar said: It is twice. He again sought permission for the third time and Umar said: It is thrice. He (Abu Musa) then went back. He (Hadrat 'Umar) (sent someone) to pursue him so that he should be brought back. Thereupon he (Hadrat Umar) said: If this act (of yours is in accordance with the command of Allah's Messenger (ﷺ) you have preserved in your mind, then it is all right, otherwise (I shall give you such a severe punishment) that it will serve as an example to others. Abu Sa'id said: Then he (Abu Musa) came to us and said: Do you remember Allah's Messenger (ﷺ) having said this:" Permission is for three times"? They (Companions sitting in that cothpany) began to laugh, whereupon he (Abu Musa) said: There comes to you your Muslim brother who had been perturbed and you laugh. Abu Sa'id said: (Well), you go forth. I shall be your participant in this trouble of yours. So he came to him (Hadrat Umar) and said: Here is Abu Sa'id (to support my statement).