क़ुरआन की दुआएँ

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"رَبَّنَا آتِنَا فِي الدُّنْيَا حَسَنَةً وَفِي الْآخِرَةِ حَسَنَةً وَقِنَا عَذَابَ النَّارِ". [الْبَقَرَةُ - 201].

“ऐ हमारे रब, हमें दुनिया में भलाई दे और आख़िरत में भी भलाई दे तथा हमें आग की यातना से बचा।” [सूरह अल-बक़रह, 201]।

"رَبَّنَا أَفْرِغْ عَلَيْنَا صَبْرًا وَثَبِّتْ أَقْدَامَنَا وَانصُرْنَا عَلَى الْقَوْمِ الْكَافِرِينَ". [الْبَقَرَةُ - 250].

“ऐ हमारे रब, हम पर धैर्य उतार, हमारे क़दम मज़बूत कर और इनकार करने वाले लोगों के मुक़ाबले हमारी सहायता कर।” [सूरह अल-बक़रह, 250]।

"رَبَّنَا لَا تُؤَاخِذْنَا إِن نَّسِينَا أَوْ أَخْطَأْنَا ۚ رَبَّنَا وَلَا تَحْمِلْ عَلَيْنَا إِصْرًا كَمَا حَمَلْتَهُ عَلَى الَّذِينَ مِن قَبْلِنَا ۚ رَبَّنَا وَلَا تُحَمِّلْنَا مَا لَا طَاقَةَ لَنَا بِهِ ۖ وَاعْفُ عَنَّا وَاغْفِرْ لَنَا وَارْحَمْنَا ۚ أَنتَ مَوْلَانَا فَانصُرْنَا عَلَى الْقَوْمِ الْكَافِرِينَ". [الْبَقَرَةُ - 286].

“हमारे रब, यदि हम भूल जाएँ या गलती करें तो हमें न पकड़। हमारे रब, हम पर वैसा बोझ न डाल जैसा तूने हमसे पहले लोगों पर डाला था। हमारे रब, हम पर वह बोझ न डाल जिसकी हमें शक्ति नहीं। हमें माफ़ कर, हमें क्षमा कर और हम पर दया कर। तू ही हमारा संरक्षक है, इसलिए इनकार करने वाले लोगों के विरुद्ध हमारी सहायता कर।” [अल-बक़रा 2:286]

"رَبَّنَا لَا تُزِغْ قُلُوبَنَا بَعْدَ إِذْ هَدَيْتَنَا وَهَبْ لَنَا مِن لَّدُنكَ رَحْمَةً ۚ إِنَّكَ أَنتَ الْوَهَّابُ". [آلُ عِمْرَانَ - 8].

“हमारे रब, हमें मार्गदर्शन देने के बाद हमारे दिलों को टेढ़ा न कर और अपनी ओर से हमें दया प्रदान कर। निश्चय ही तू बहुत देने वाला है।” [आल-इमरान 3:8]

"رَبَّنَا إِنَّنَا آمَنَّا فَاغْفِرْ لَنَا ذُنُوبَنَا وَقِنَا عَذَابَ النَّارِ". [آلُ عِمْرَانَ - 16].

“ऐ हमारे रब, हम ईमान लाए हैं; इसलिए हमारे पाप क्षमा कर और हमें आग की यातना से बचा।” [सूरह आल इमरान, 16]।

"رَبِّ هَبْ لِي مِن لَّدُنكَ ذُرِّيَّةً طَيِّبَةً ۖ إِنَّكَ سَمِيعُ الدُّعَاءِ". [آلُ عِمْرَانَ - 38].

“ऐ मेरे रब, मुझे अपने पास से पवित्र संतान प्रदान कर। निःसंदेह तू दुआ सुनने वाला है।” [सूरह आल इमरान, 38]।

"رَبَّنَا آمَنَّا بِمَا أَنزَلْتَ وَاتَّبَعْنَا الرَّسُولَ فَاكْتُبْنَا مَعَ الشَّاهِدِينَ". [آلُ عِمْرَانَ - 53].

“ऐ हमारे रब, हमने उस पर ईमान लाया जो तूने उतारा और रसूल का अनुसरण किया; इसलिए हमें गवाही देने वालों में लिख ले।” [सूरह आल इमरान, 53]।

"رَبَّنَا اغْفِرْ لَنَا ذُنُوبَنَا وَإِسْرَافَنَا فِي أَمْرِنَا وَثَبِّتْ أَقْدَامَنَا وَانصُرْنَا عَلَى الْقَوْمِ الْكَافِرِينَ". [آلُ عِمْرَانَ - 147].

“हमारे रब, हमारे पाप और अपने काम में हमारी ज्यादतियों को क्षमा कर, हमारे क़दम जमा दे और इनकार करने वाले लोगों के विरुद्ध हमारी सहायता कर।” [आल-इमरान 3:147]

"رَبَّنَا مَا خَلَقْتَ هَٰذَا بَاطِلًا سُبْحَانَكَ فَقِنَا عَذَابَ النَّارِ رَبَّنَا إِنَّكَ مَن تُدْخِلِ النَّارَ فَقَدْ أَخْزَيْتَهُ ۖ وَمَا لِلظَّالِمِينَ مِنْ أَنصَارٍ رَّبَّنَا إِنَّنَا سَمِعْنَا مُنَادِيًا يُنَادِي لِلْإِيمَانِ أَنْ آمِنُوا بِرَبِّكُمْ فَآمَنَّا ۚ رَبَّنَا فَاغْفِرْ لَنَا ذُنُوبَنَا وَكَفِّرْ عَنَّا سَيِّئَاتِنَا وَتَوَفَّنَا مَعَ الْأَبْرَارِ رَبَّنَا وَآتِنَا مَا وَعَدتَّنَا عَلَىٰ رُسُلِكَ وَلَا تُخْزِنَا يَوْمَ الْقِيَامَةِ ۗ إِنَّكَ لَا تُخْلِفُ الْمِيعَادَ". [آلُ عِمْرَانَ - 191-194].

“हमारे रब, तूने यह सब व्यर्थ पैदा नहीं किया। तू पवित्र है, अतः हमें आग की यातना से बचा। हमारे रब, जिसे तू आग में डाले उसे तूने अपमानित किया, और अत्याचारियों का कोई सहायक नहीं। हमारे रब, हमने एक पुकारने वाले को ईमान की ओर बुलाते सुना कि अपने रब पर ईमान लाओ, तो हम ईमान ले आए। हमारे रब, हमारे पाप क्षमा कर, हमारी बुराइयाँ दूर कर और हमें नेक लोगों के साथ मृत्यु दे। हमारे रब, हमें वह प्रदान कर जिसका तूने अपने रसूलों के माध्यम से वादा किया है और क़ियामत के दिन हमें अपमानित न कर। निश्चय ही तू अपना वादा नहीं तोड़ता।” [आल-इमरान 3:191–194]

"رَبَّنَا ظَلَمْنَا أَنفُسَنَا وَإِن لَّمْ تَغْفِرْ لَنَا وَتَرْحَمْنَا لَنَكُونَنَّ مِنَ الْخَاسِرِينَ". [الْأَعْرَافُ - 23].

“हमारे रब, हमने अपने ऊपर अत्याचार किया। यदि तू हमें क्षमा न करे और हम पर दया न करे तो हम अवश्य घाटा उठाने वालों में होंगे।” [अल-आराफ़ 7:23]

"رَبَّنَا لَا تَجْعَلْنَا مَعَ الْقَوْمِ الظَّالِمِينَ". [الْأَعْرَافُ - 47].

“ऐ हमारे रब, हमें अत्याचारी लोगों के साथ न रखना।” [सूरह अल-आराफ़, 47]।

"رَبَّنَا أَفْرِغْ عَلَيْنَا صَبْرًا وَتَوَفَّنَا مُسْلِمِينَ". [الْأَعْرَافُ - 126].

“ऐ हमारे रब, हम पर धैर्य उतार और हमें मुसलमान होने की अवस्था में मृत्यु दे।” [सूरह अल-आराफ़, 126]।

"حَسْبِيَ اللَّهُ لَا إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ ۖ عَلَيْهِ تَوَكَّلْتُ ۖ وَهُوَ رَبُّ الْعَرْشِ الْعَظِيمِ". [التَّوْبَةُ - 129].

“अल्लाह मेरे लिए पर्याप्त है। उसके सिवा कोई उपासना के योग्य ईश्वर नहीं। मैंने उसी पर भरोसा किया और वही महान अर्श का रब है।” [सूरह अत-तौबा, 129]।

"رَبَّنَا لَا تَجْعَلْنَا فِتْنَةً لِّلْقَوْمِ الظَّالِمِينَ وَنَجِّنَا بِرَحْمَتِكَ مِنَ الْقَوْمِ الْكَافِرِينَ". [يُونُسُ - 85-86].

“हमारे रब, हमें अत्याचारी लोगों के लिए परीक्षा न बना और अपनी दया से हमें इनकार करने वाले लोगों से बचा ले।” [यूनुस 10:85–86]

"رَبِّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ أَنْ أَسْأَلَكَ مَا لَيْسَ لِي بِهِ عِلْمٌ ۖ وَإِلَّا تَغْفِرْ لِي وَتَرْحَمْنِي أَكُن مِّنَ الْخَاسِرِينَ". [هُودٌ - 47].

“मेरे रब, मैं तेरी शरण माँगता हूँ कि तुझसे वह माँगूँ जिसका मुझे ज्ञान नहीं। यदि तू मुझे क्षमा न करे और मुझ पर दया न करे तो मैं घाटा उठाने वालों में हो जाऊँगा।” [हूद 11:47]

"رَبِّ اجْعَلْنِي مُقِيمَ الصَّلَاةِ وَمِن ذُرِّيَّتِي ۚ رَبَّنَا وَتَقَبَّلْ دُعَاءِ". [إِبْرَاهِيمُ - 40].

“ऐ मेरे रब, मुझे और मेरी संतान में से भी नमाज़ क़ायम करने वाला बना। ऐ हमारे रब, मेरी दुआ स्वीकार कर।” [सूरह इब्राहीम, 40]।

"رَبَّنَا اغْفِرْ لِي وَلِوَالِدَيَّ وَلِلْمُؤْمِنِينَ يَوْمَ يَقُومُ الْحِسَابُ". [إِبْرَاهِيمُ - 41].

“ऐ हमारे रब, जिस दिन हिसाब क़ायम होगा उस दिन मुझे, मेरे माता-पिता को और ईमान वालों को क्षमा कर।” [सूरह इब्राहीम, 41]।

"رَّبِّ أَدْخِلْنِي مُدْخَلَ صِدْقٍ وَأَخْرِجْنِي مُخْرَجَ صِدْقٍ وَاجْعَل لِّي مِن لَّدُنكَ سُلْطَانًا نَّصِيرًا". [الْإِسْرَاءُ - 80].

“मेरे रब, मुझे सच्चाई के साथ प्रवेश दे और सच्चाई के साथ निकाल, और अपने पास से मेरे लिए सहायक शक्ति प्रदान कर।” [अल-इसरा 17:80]

"رَبَّنَا آتِنَا مِن لَّدُنكَ رَحْمَةً وَهَيِّئْ لَنَا مِنْ أَمْرِنَا رَشَدًا". [الْكَهْفُ - 10].

“ऐ हमारे रब, हमें अपने पास से दया दे और हमारे मामले में हमारे लिए सही मार्ग तैयार कर।” [सूरह अल-कहफ़, 10]।

"رَبِّ اشْرَحْ لِي صَدْرِي وَيَسِّرْ لِي أَمْرِي وَاحْلُلْ عُقْدَةً مِّن لِّسَانِي يَفْقَهُوا قَوْلِي". [طه - 25-28].

“ऐ मेरे रब, मेरा सीना खोल दे, मेरा काम आसान कर दे और मेरी ज़बान की गाँठ खोल दे ताकि वे मेरी बात समझें।” [सूरह ताहा, 25–28]।

"رَّبِّ زِدْنِي عِلْمًا". [طه - 114].

“ऐ मेरे रब, मेरे ज्ञान में वृद्धि कर।” [सूरह ताहा, 114]।

"لَا إِلَٰهَ إِلَّا أَنتَ سُبْحَانَكَ إِنِّي كُنتُ مِنَ الظَّالِمِينَ". [الْأَنْبِيَاءُ - 87].

“तेरे सिवा कोई उपासना के योग्य ईश्वर नहीं। तू पवित्र है। निश्चय ही मैं अत्याचार करने वालों में से था।” [सूरह अल-अंबिया, 87]।

"رَبِّ لَا تَذَرْنِي فَرْدًا وَأَنتَ خَيْرُ الْوَارِثِينَ". [الْأَنْبِيَاءُ - 89].

“ऐ मेरे रब, मुझे अकेला न छोड़ और तू सबसे अच्छा वारिस है।” [सूरह अल-अंबिया, 89]।

"رَّبِّ أَعُوذُ بِكَ مِنْ هَمَزَاتِ الشَّيَاطِينِ وَأَعُوذُ بِكَ رَبِّ أَن يَحْضُرُونِ". [الْمُؤْمِنُونَ - 97-98].

“ऐ मेरे रब, मैं शैतानों की उकसाहट से तेरी पनाह माँगता हूँ और ऐ मेरे रब, उनके मेरे पास आने से भी तेरी पनाह माँगता हूँ।” [सूरह अल-मुमिनून, 97–98]।

"رَبَّنَا آمَنَّا فَاغْفِرْ لَنَا وَارْحَمْنَا وَأَنتَ خَيْرُ الرَّاحِمِينَ". [الْمُؤْمِنُونَ - 109].

“ऐ हमारे रब, हम ईमान लाए हैं; हमें क्षमा कर और हम पर दया कर। तू सबसे अच्छा दया करने वाला है।” [सूरह अल-मुमिनून, 109]।

"رَّبِّ اغْفِرْ وَارْحَمْ وَأَنتَ خَيْرُ الرَّاحِمِينَ". [الْمُؤْمِنُونَ - 118].

“ऐ मेरे रब, क्षमा कर और दया कर, और तू सबसे अच्छा दया करने वाला है।” [सूरह अल-मुमिनून, 118]।

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हदीस पुस्तकालय से

हदीस
Narrated Abu Qatada: that once he was with Allah's Messenger (ﷺ) (on the way to Mecca). When he had covered some of the way to Mecca, he and some companions of his, who were in the state of lhram. remained behind the Prophet while Abu Qatada himself was not in the state of Ihram. Abu Qatada, seeing an onager rode his horse and asked his companions to hand him a whip, but they refused. He then asked them to hand him his spear, but they refused. Then he took it himself and attacked the onager and killed it. Some of the Companions of Allah's Messenger (ﷺ) ate of it, but some others refused to eat. When they met Allah's Apostle they asked him about that. He said, "It was meal given to you by Allah."