व्यापक दुआएँ

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اللَّهُمَّ يَا بَارِئَ الْبَرِيَّاتِ ، وَغَافِرَ الْخَطِيئَاتِ ، وَعَالِمَ الْخَفِيَّاتِ ، الْمُطَّلِعَ عَلَى الضَّمَائِرِ وَالنِّيَّاتِ ، يَا مَنْ أَحَاطَ بِكُلِّ شَيْءٍ عِلْمًا ، وَوَسِعَ كُلَّ شَيْءٍ رَحْمَةً ، وَقَهَرَ كُلَّ مَخْلُوقٍ عِزَّةً وَحُكْماً ، اغْفِرْ لِي ذُنُوبِي ، وَاسْتُرْ عُيُوبِيَ ، وَتَجَاوَزْ عَنْ سَيِّئَاتِيَ إِنَّكَ أَنْتَ الْغَفُورُ الرَّحِيمُ.

اللَّهُمَّ يَا سَمِيعَ الدَّعَوَاتِ ، يَا مُقِيلَ الْعَثَرَاتِ ، يَا قَاضِيَ الْحَاجَاتِ ، يَا كَاشِفَ الْكَرُبَاتِ ، يَا رَفِيعَ الدَّرَجَاتِ ، وَيَا غَافِرَ الزَّلَّاتِ ، اغْفِرْ لِلْمُسْلِمِينَ وَالْمُسْلِمَاتِ ، وَالْمُؤْمِنِينَ وَالْمُؤْمِنَاتِ، الْأَحْيَاءِ مِنْهُمْ وَالْأَمْوَاتِ ، إِنَّكَ سَمِيعٌ قَرِيبٌ مُجِيبُ الدَّعَوَاتِ.

اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ بِاسْمِكَ الْأَعْظَمِ ، الَّذِي إِذَا دُعِيتَ بِهِ أَجَبْتَ ، وَإِذَا سُئِلْتَ بِهِ أَعْطَيْتَ ، أَسْأَلُكَ بِأَنِّي أَشْهَدُ أَنَّكَ أَنْتَ اللَّهُ لَا إِلَهَ إِلَّا أَنْتَ ، الْأَحَدُ الصَّمَدُ ، الَّذِي لَمْ يَلِدْ، وَلَمْ يُولَدْ ، وَلَمْ يَكُنْ لَهُ كُفُوًا أَحَدٌ ؛ أَنْ تَغْفِرَ لِي ذُنُوبِي ، إِنَّكَ أَنْتَ الْغَفُورُ الرَّحِيمُ.

اللَّهُمَّ إِنَّكَ عَفُوٌّ كَرِيمٌ تُحِبُّ الْعَفْوَ فَاعْفُ عَنِّي.

اللَّهُمَّ رَبِّ اغْفِرْ لِي وَلِوَالِدَيَّ وَلِمَنْ دَخَلَ بَيْتِيَ مُؤْمِنًا وَلِلْمُؤْمِنِينَ وَالْمُؤْمِنَاتِ.

ऐ अल्लाह, सृष्टि को अस्तित्व देने वाले, पापों को क्षमा करने वाले, छिपी बातों को जानने वाले और दिलों तथा इरादों से परिचित; ऐ वह जिसका ज्ञान हर चीज़ को घेरे हुए है, जिसकी दया हर चीज़ पर विस्तृत है और जिसने अपनी शक्ति तथा शासन से हर सृष्टि को अधीन किया है, मेरे पाप क्षमा कर, मेरे ऐब ढँक और मेरी बुराइयों को माफ़ कर। निश्चय ही तू बहुत क्षमा करने वाला, दयालु है।

ऐ अल्लाह, दुआएँ सुनने वाले, चूक माफ़ करने वाले, आवश्यकताएँ पूरी करने वाले, संकट दूर करने वाले, दर्जे ऊँचे करने वाले और गलतियाँ क्षमा करने वाले, मुसलमान पुरुषों और स्त्रियों तथा ईमान वाले पुरुषों और स्त्रियों को, उनमें जीवित और मृत सभी को क्षमा कर। निश्चय ही तू सुनने वाला, निकट और दुआ का उत्तर देने वाला है।

ऐ अल्लाह, मैं तुझसे तेरे महानतम नाम के द्वारा माँगता हूँ कि जब उसके द्वारा तुझे पुकारा जाए तो तू उत्तर देता है और जब माँगा जाए तो तू देता है। मैं तुझसे इस गवाही के द्वारा माँगता हूँ कि तू ही अल्लाह है, तेरे सिवा कोई इबादत के योग्य नहीं; तू एक है, सबकी आवश्यकताओं का आश्रय है, न तूने जन्म दिया, न तू जन्मा और न कोई तेरा समकक्ष है। मेरे पाप क्षमा कर; निश्चय ही तू बहुत क्षमा करने वाला, दयालु है।

ऐ अल्लाह, निश्चय ही तू बहुत माफ़ करने वाला, उदार है और माफ़ करना पसंद करता है, इसलिए मुझे माफ़ कर।

ऐ अल्लाह, मेरे रब, मुझे, मेरे माता-पिता को, जो ईमान की अवस्था में मेरे घर में प्रवेश करे उसे और ईमान वाले पुरुषों तथा स्त्रियों को क्षमा कर।

اللَّهُمَّ اغْفِرْ لِي خَطِيئَتِي وَجَهْلِي ، وَإِسْرَافِي فِي أَمْرِي ، وَمَا أَنْتَ أَعْلَمُ بِهِ مِنِّي ، اللَّهُمَّ اغْفِرْ لِي هَزْلِي وَجِدِّي ، وَخَطَئِي وَعَمْدِي ، وَكُلُّ ذَلِكَ عِنْدِي.

اللَّهُمَّ رَبِّ إِنِّي ظَلَمْتُ نَفْسِي فَاغْفِرْ لِي.

اللَّهُمَّ أَنْتَ رَبِّي لَا إِلَهَ إِلَّا أَنْتَ خَلَقْتَنِي وَأَنَا عَبْدُكَ ، وَأَنَا عَلَى عَهْدِكَ وَوَعْدِكَ مَا اسْتَطَعْتُ، أَعُوذُ بِكَ مِنْ شَرِّ مَا صَنَعْتُ أَبُوءُ لَكَ بِنِعْمَتِكَ عَلَيَّ وَأَبُوءُ لَكَ بِذَنْبِي فَاغْفِرْ لِي فَإِنَّهُ لَا يَغْفِرُ الذُّنُوبَ إِلَّا أَنْتَ.

اللَّهُمَّ اغْفِرْ لِي ، وَارْحَمْنِي وَاهْدِنِي ، وَعَافِنِي وَارْزُقْنِي ، وَاجْبُرْنِي ، وَارْفَعْنِي.

اللَّهُمَّ يَا مَنْ لَا تَضُرُّهُ الذُّنُوبُ ، وَلَا تُنْقِصُهُ الْمَغْفِرَةُ ، اغْفِرْ لَنَا مَا لَا يَضُرُّكَ ، وَهَبْ لَنَا مَا لَا يُنْقِصُكَ.

ऐ अल्लाह, मेरी गलती, मेरी अज्ञानता, मेरे काम में मेरी ज़्यादती और वह क्षमा कर जिसे तू मुझसे अधिक जानता है। ऐ अल्लाह, मेरा हँसी में और गंभीरता से किया हुआ, भूल से और जानबूझकर किया हुआ क्षमा कर; ये सब मुझमें हैं।

ऐ अल्लाह, मेरे रब, मैंने अपने ऊपर अत्याचार किया, इसलिए मुझे क्षमा कर।

ऐ अल्लाह, तू मेरा रब है, तेरे सिवा कोई इबादत के योग्य नहीं। तूने मुझे पैदा किया और मैं तेरा बंदा हूँ। मैं अपनी सामर्थ्य भर तेरे साथ अपने वचन और प्रतिज्ञा पर कायम हूँ। मैंने जो किया उसकी बुराई से तेरी शरण माँगता हूँ। मैं अपने ऊपर तेरी नेमत और अपना पाप स्वीकार करता हूँ, इसलिए मुझे क्षमा कर, क्योंकि तेरे सिवा पापों को कोई क्षमा नहीं करता।

ऐ अल्लाह, मुझे क्षमा कर, मुझ पर दया कर, मुझे मार्गदर्शन दे, मुझे कुशलता दे, रोज़ी दे, मेरी कमी पूरी कर और मेरा दर्जा ऊँचा कर।

ऐ अल्लाह, ऐ वह जिसे पाप नुकसान नहीं पहुँचाते और जिसकी क्षमा से उसमें कमी नहीं आती, हमारे उन पापों को क्षमा कर जो तुझे नुकसान नहीं पहुँचाते और हमें वह दे जिससे तुझमें कमी नहीं आती।

اللَّهُمَّ اغْفِرْ لِي ذَنْبِي كُلَّهُ ، دِقَّهُ وَجِلَّهُ ، وَأَوَّلَهُ وَآخِرَهُ ، وَعَلَانِيَتَهُ وَسِرَّهُ.

اللَّهُمَّ إِنَّ ذُنُوبِي عِظَامٌ وَهِيَ صِغَارٌ فِي جَنْبِ عَفْوِكَ يَا كَرِيمُ ، فَاغْفِرْهَا لِي.

اللَّهُمَّ اغْفِرْ لِي ذَنْبِي ، وَوَسِّعْ لِي فِي دَارِي ، وَبَارِكْ لِي فِي رِزْقِي.

اللَّهُمَّ رَبَّنَا لَا تُؤَاخِذْنَا إِنْ نَسِينَا أَوْ أَخْطَأْنَا ، رَبَّنَا وَلَا تَحْمِلْ عَلَيْنَا إِصْرًا كَمَا حَمَلْتَهُ عَلَى الَّذِينَ مِنْ قَبْلِنَا ، رَبَّنَا وَلَا تُحَمِّلْنَا مَا لَا طَاقَةَ لَنَا بِهِ ، وَاعْفُ عَنَّا وَاغْفِرْ لَنَا وَارْحَمْنَا أَنْتَ مَوْلَانَا فَانْصُرْنَا عَلَى الْقَوْمِ الْكَافِرِينَ.

اللَّهُمَّ إِنَّا قَدْ أَطَعْنَاكَ فِي أَحَبِّ الْأَشْيَاءِ إِلَيْكَ أَنْ تُطَاعَ فِيهِ ، الْإِيمَانِ بِكَ ، وَالْإِقْرَارِ بِكَ ، وَلَمْ نَعْصِكَ فِي أَبْغَضِ الْأَشْيَاءِ أَنْ تُعْصَى فِيهِ ؛ الْكُفْرِ وَالْجَحْدِ بِكَ ، اللَّهُمَّ فَاغْفِرْ لَنَا مَا بَيْنَهُمَا.

ऐ अल्लाह, मेरे सारे पाप क्षमा कर: छोटे और बड़े, पहले और आख़िरी, खुले और छिपे।

ऐ अल्लाह, मेरे पाप बड़े हैं, पर तेरी माफ़ी के सामने छोटे हैं, ऐ उदार; इसलिए उन्हें क्षमा कर दे।

ऐ अल्लाह, मेरा पाप क्षमा कर, मेरे घर में मेरे लिए विस्तार दे और मेरी रोज़ी में बरकत दे।

ऐ अल्लाह, हमारे रब, यदि हम भूल जाएँ या गलती करें तो हमें न पकड़। हमारे रब, हम पर वैसा बोझ न डाल जैसा तूने हमसे पहले लोगों पर डाला था। हमारे रब, हम पर वह बोझ न डाल जिसकी हमें शक्ति नहीं। हमें माफ़ कर, क्षमा कर और हम पर दया कर। तू ही हमारा संरक्षक है, अतः इनकार करने वाले लोगों के विरुद्ध हमारी सहायता कर।

ऐ अल्लाह, जिस बात में तेरी आज्ञा मानना तुझे सबसे प्रिय है, हमने उसमें तेरी आज्ञा मानी: तुझ पर ईमान लाने और तुझे स्वीकार करने में। और जिस बात में तेरी अवज्ञा तुझे सबसे अप्रिय है, हमने उसमें तेरी अवज्ञा नहीं की: तेरा इनकार और तुझे न मानने में। ऐ अल्लाह, इनके बीच के हमारे पाप क्षमा कर।

اللَّهُمَّ اغْفِرْ لِي مَا قَدَّمْتُ وَمَا أَخَّرْتُ ، وَمَا أَعْلَنْتُ وَمَا أَسْرَرْتُ ، وَمَا أَنْتَ أَعْلَمُ بِهِ مِنِّي ، أَنْتَ الْمُقَدِّمُ وَأَنْتَ الْمُؤَخِّرُ لَا إِلَهَ إِلَّا أَنْتَ.

اللَّهُمَّ رَبَّنَا اغْفِرْ لَنَا ذُنُوبَنَا وَكَفِّرْ عَنَّا سَيِّئَاتِنَا وَتَوَفَّنَا مَعَ الْأَبْرَارِ.

اللَّهُمَّ رَبَّنَا اغْفِرْ لَنَا وَلِإِخْوَانِنَا الَّذِينَ سَبَقُونَا بِالْإِيمَانِ ، رَبَّنَا وَسِعْتَ كُلَّ شَيْءٍ رَحْمَةً وَعِلْمًا فَاغْفِرْ لِلَّذِينَ تَابُوا وَاتَّبَعُوا سَبِيلَكَ وَقِهِمْ عَذَابَ الْجَحِيمِ.

اللَّهُمَّ أَقِلْ عَثَرَاتِنَا ، وَاغْفِرْ زَلَّاتِنَا ، وَكَفِّرْ عَنَّا سَيِّئَاتِنَا ، وَتَوَفَّنَا مَعَ الْأَبْرَارِ.

اللَّهُمَّ بَاعِدْ بَيْنِي وَبَيْنَ خَطَايَايَ كَمَا بَاعَدْتَ بَيْنَ الْمَشْرِقِ وَالْمَغْرِبِ ، اللَّهُمَّ اغْسِلْنِي مِنْ خَطَايَايَ بِالْمَاءِ وَالثَّلْجِ وَالْبَرَدِ ، اللَّهُمَّ نَقِّنِي مِنْ الْخَطَايَا كَمَا يُنَقَّى الثَّوْبُ الْأَبْيَضُ مِنَ الدَّنَسِ.

ऐ अल्लाह, मेरे पहले और बाद के, खुले और छिपे पाप क्षमा कर और वह भी जिसे तू मुझसे अधिक जानता है। तू आगे करने वाला और पीछे करने वाला है; तेरे सिवा कोई इबादत के योग्य नहीं।

ऐ अल्लाह, हमारे रब, हमारे पाप क्षमा कर, हमारी बुराइयाँ दूर कर और हमें नेक लोगों के साथ मृत्यु दे।

ऐ अल्लाह, हमारे रब, हमें और हमारे उन भाइयों को क्षमा कर जो ईमान में हमसे पहले आए। हमारे रब, तेरी दया और ज्ञान ने हर चीज़ को घेर रखा है, इसलिए तौबा करने वालों और तेरे रास्ते का अनुसरण करने वालों को क्षमा कर और उन्हें जहन्नम की यातना से बचा।

ऐ अल्लाह, हमारी चूक माफ़ कर, हमारी फिसलनें क्षमा कर, हमारी बुराइयाँ दूर कर और हमें नेक लोगों के साथ मृत्यु दे।

ऐ अल्लाह, मेरे और मेरे पापों के बीच उतनी दूरी कर दे जितनी पूर्व और पश्चिम के बीच की है। ऐ अल्लाह, मुझे मेरे पापों से पानी, बर्फ़ और ओलों से धो। ऐ अल्लाह, मुझे पापों से ऐसे साफ़ कर जैसे सफ़ेद कपड़े को मैल से साफ़ किया जाता है।

اللَّهُمَّ إِنِّي ظَلَمْتُ نَفْسِي ظُلْمًا كَثِيرًا ، وَلَا يَغْفِرُ الذُّنُوبَ إِلَّا أَنْتَ. فَاغْفِرْ لِي مَغْفِرَةً مِنْ عِنْدَكَ ، وَارْحَمْنِي إِنَّكَ أَنْتَ الْغَفُورُ الرَّحِيمُ.

اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ يَا اللَّهُ بِأَنَّكَ الْوَاحِدُ الْأَحَدُ ، الصَّمَدُ ، الَّذِي لَمْ يَلِدْ وَلَمْ يُولَدْ وَلَمْ يَكُنْ لَهُ كُفُواً أَحَدٌ ، أَنْ تَغْفِرَ لِي ذُنُوبِي ، إِنَّكَ أَنْتَ الْغَفُورُ الرَّحِيمُ.

اللَّهُمَّ إِلَهِي : حُجَّتِي حَاجَتِي ، وَعُدَّتِي فَاقَتِي ، فَارْحَمْنِي.

اللَّهُمَّ إِلَهِي : كَيْفَ أَمْتَنِعُ بِالذَّنْبِ مِنَ الدُّعَاءِ ، وَلَا أَرَاكَ تَمْنَعُ مَعَ الذَّنْبِ مِنَ الْعَطَاءِ ، فَإِنْ غَفَرْتَ فَخَيْرُ رَاحِمٍ أَنْتَ ، وَإِنْ عَذَّبْتَ فَغَيْرُ ظَالِمٍ أَنْتَ.

اللَّهُمَّ إِلَهِي: أَسْأَلُكَ تَذَلُّلاً فَأَعْطِنِي تَفَضُّلاً.

ऐ अल्लाह, मैंने अपने ऊपर बहुत अत्याचार किया और तेरे सिवा कोई पापों को क्षमा नहीं करता। इसलिए अपनी ओर से मुझे क्षमा कर और मुझ पर दया कर; निश्चय ही तू बहुत क्षमा करने वाला, दयालु है।

ऐ अल्लाह, मैं तुझसे माँगता हूँ कि मेरे पाप क्षमा कर, क्योंकि तू एक, अद्वितीय और सबकी आवश्यकताओं का आश्रय है; न तूने जन्म दिया, न तू जन्मा और न कोई तेरा समकक्ष है। निश्चय ही तू बहुत क्षमा करने वाला, दयालु है।

ऐ अल्लाह, मेरे उपास्य, मेरी आवश्यकता ही मेरी दलील है और मेरा अभाव ही मेरी पूँजी है; अतः मुझ पर दया कर।

ऐ अल्लाह, मेरे उपास्य, मैं पाप के कारण दुआ करने से कैसे रुकूँ जबकि तू पाप के बावजूद देना नहीं रोकता? यदि तू क्षमा करे तो तू सबसे अच्छा दया करने वाला है और यदि दंड दे तो तू अन्याय करने वाला नहीं है।

ऐ अल्लाह, मेरे उपास्य, मैं विनम्र होकर तुझसे माँगता हूँ, तू अपने अनुग्रह से मुझे दे।

اللَّهُمَّ يَا مَنْ عَلَى الْعَرْشِ اسْتَوَى ، يَا مَنْ خَلَقَ فَسَوَّى وَقَدَّرَ فَهَدَى ، وَأَعْطَى كُلَّ شَيْءٍ خَلْقَهُ ثُمَّ هَدَى ، يَا مَنْ أَضْحَكَ وَأَبْكَى، وَأَمَاتَ وَأَحْيَا ، وَأَسْعَدَ وَأَشْقَى ، وَأَوْجَدَ وَأَبْلَى ، وَرَفَعَ وَخَفَضَ ، وَأَعَزَّ وَأَذَلَّ، وَأَعْطَى وَمَنَعَ ، وَرَفَعَ وَوَضَعَ.

اللَّهُمَّ يَا مَنْ شَقَّ الْبِحَارَ ، وَأَجْرَى الْأَنْهَارَ ، وَكَوَّرَ النَّهَارَ عَلَى اللَّيْلِ وَاللَّيْلَ عَلَى النَّهَارِ ، يَا مَنْ هَدَى مِنْ ضَلَالَةٍ ، وَأَنْقَذَ مِنْ جَهَالَةٍ ، وَأَنَارَ الْأَبْصَارَ ، وَأَحْيَا الضَّمَائِرَ وَالْأَفْكَارَ.

اللَّهُمَّ اهْدِنَا فِيمَنْ هَدَيْتَ ، وَعَافِنَا فِيمَنْ عَافَيْتَ ، وَتَوَلَّنَا فِيمَنْ تَوَلَّيْتَ.

اللَّهُمَّ اهْدِنَا الصِّرَاطَ الْمُسْتَقِيمَ ، صِرَاطَ الَّذِينَ أَنْعَمْتَ عَلَيْهِمْ مِنَ النَّبِيِّينَ وَالصِّدِّيقِينَ وَالشُّهَدَاءِ وَالصَّالِحِينَ.

اللَّهُمَّ وَفِّقْنَا لِهُدَاكَ وَاجْعَلْ عَمَلَنَا فِي رِضَاكَ.

ऐ अल्लाह, ऐ अर्श पर इस्तिवा फ़रमाने वाले, ऐ पैदा करके संतुलित बनाने और नियति तय करके मार्ग दिखाने वाले, हर चीज़ को उसकी रचना देकर फिर मार्ग दिखाने वाले; ऐ हँसाने और रुलाने, मृत्यु देने और जीवन देने, सौभाग्य और दुर्भाग्य देने, अस्तित्व देने और परीक्षा लेने, ऊँचा और नीचा करने, सम्मान और अपमान देने, देने और रोकने, उठाने और गिराने वाले।

ऐ अल्लाह, ऐ समुद्रों को चीरने, नदियों को बहाने, दिन को रात पर और रात को दिन पर लपेटने वाले; ऐ भटकाव से मार्ग दिखाने, अज्ञानता से बचाने, निगाहों को प्रकाश देने और अंतःकरण तथा विचारों को जीवित करने वाले।

ऐ अल्लाह, जिन्हें तूने मार्ग दिखाया उनमें हमें भी मार्ग दिखा; जिन्हें कुशलता दी उनमें हमें भी कुशलता दे और जिन्हें संरक्षण दिया उनमें हमें भी संरक्षण दे।

ऐ अल्लाह, हमें सीधा रास्ता दिखा, उनका रास्ता जिन पर तूने नेमत की: नबियों, सत्यनिष्ठों, शहीदों और नेक लोगों का।

ऐ अल्लाह, हमें अपने मार्गदर्शन की तौफ़ीक़ दे और हमारे कर्म अपनी प्रसन्नता में रख।

اللَّهُمَّ أَرِنَا الْحَقَّ حَقًّا وَارْزُقْنَا اتِّبَاعَهُ، وَأَرِنَا الْبَاطِلَ بَاطِلاً وَارْزُقْنَا اجْتِنَابَهُ.

اللَّهُمَّ آتِ نَفْسِي تَقْوَاهَا ، وَزَكِّهَا أَنْتَ خَيْرُ مَنْ زَكَّاهَا، أَنْتَ وَلِيُّهَا وَمَوْلَاهَا.

اللَّهُمَّ رَبَّنَا أَتْمِمْ لَنَا نُورَنَا وَاغْفِرْ لَنَا إِنَّكَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ.

اللَّهُمَّ حَبِّبْ إِلَيْنَا الْإِيمَانَ وَزَيِّنْهُ فِي قُلُوبِنَا ، وَكَرِّهِ إِلَيْنَا الْكُفْرَ وَالْفُسُوقَ وَالْعِصْيَانَ ، وَاجْعَلْنَا مِنَ الرَّاشِدِينَ.

اللَّهُمَّ مُصَرِّفَ الْقُلُوبِ صَرِّفْ قُلُوبَنَا عَلَى طَاعَتِكَ.

ऐ अल्लाह, हमें सत्य को सत्य दिखा और उसका अनुसरण करने की तौफ़ीक़ दे; हमें असत्य को असत्य दिखा और उससे बचने की तौफ़ीक़ दे।

ऐ अल्लाह, मेरे मन को तक़वा प्रदान कर और उसे पवित्र कर; तू ही सबसे अच्छा पवित्र करने वाला है, तू उसका संरक्षक और स्वामी है।

ऐ अल्लाह, हमारे रब, हमारा नूर पूरा कर और हमें क्षमा कर। निश्चय ही तू हर चीज़ पर सक्षम है।

ऐ अल्लाह, ईमान को हमारा प्रिय बना और उसे हमारे दिलों में सुशोभित कर; कुफ़्र, पापाचार और अवज्ञा को हमारे लिए अप्रिय बना और हमें सही मार्ग पाने वालों में शामिल कर।

ऐ अल्लाह, दिलों को फेरने वाले, हमारे दिलों को अपनी आज्ञाकारिता की ओर फेर दे।

اللَّهُمَّ خُذْ بِنَوَاصِينَا لِلْبِرِّ وَالتَّقْوَى ، وَلِمَا تُحِبُّ مِنَ الْعَمَلِ وَتَرْضَى.

اللَّهُمَّ رَبَّ جِبْرَائِيلَ وَمِيكَائِيلَ ، وَإِسْرَافِيلَ ، فَاطِرَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ ، عَالِمَ الْغَيْبِ وَالشَّهَادَةِ ، أَنْتَ تَحْكُمُ بَيْنَ عِبَادِكَ فِيمَا كَانُوا فِيهِ يَخْتَلِفُونَ ، اهْدِنَا لِمَا اخْتُلِفَ فِيهِ مِنَ الْحَقِّ بِإِذْنِكَ ، إِنَّكَ تَهْدِي مَنْ تَشَاءُ إِلَى صِرَاطٍ مُسْتَقِيمٍ.

اللَّهُمَّ إِنِّي عَبْدُكَ ابْنُ عَبْدِكَ ابْنُ أَمَتِكَ ، نَاصِيَتِي بِيَدِكَ ، مَاضٍ فِيَّ حُكْمُكَ ، عَدْلٌ فِيَّ قَضَاؤُكَ ، أَسْأَلُكَ بِكُلِّ اسْمٍ هُوَ لَكَ ، سَمَّيْتَ بِهِ نَفْسَكَ ، أَوْ أَنْزَلْتَهُ فِي كِتَابِكَ ، أَوْ عَلَّمْتَهُ أَحَداً مِنْ خَلْقِكَ ، أَوْ اسْتَأْثَرْتَ بِهِ فِي عِلْمِ الْغَيْبِ عِنْدَكَ ، أَنْ تَجْعَلَ الْقُرْآنَ رَبِيعَ قَلْبِي ، وَنُورَ صَدْرِي ، وَجَلَاءَ حَزَنِي ، وَذَهَابَ هَمِّي.

اللَّهُمَّ اجْعَلْ فِي قَلْبِي نُوراً ، وَفِي سَمْعِي نُوراً ، وَفِي بَصَرِي نُوراً ، وَعَنْ يَمِينِي نُوراً ، وَعَنْ شِمَالِي نُوراً ، وَمِنْ بَيْنَ يَدَيَّ نُوراً ، وَمِنْ خَلْفِي نُوراً ، وَمِنْ فَوْقِي نُوراً ، وَمِنْ تَحْتِي نُوراً ، وَاجْعَلْ لِي نُوراً ، وَأَعْظِمْ لِي نُوراً.

اللَّهُمَّ أَغْنِنِي بِالْعِلْمِ ، وَزَيِّنِّي بِالْحِلْمِ ، وَأَكْرِمْنِي بِالتَّقْوَى ، وَجَمِّلْنِي بِالْعَافِيَةِ.

ऐ अल्लाह, हमें नेकी, तक़वा और उन कर्मों की ओर ले चल जिन्हें तू पसंद करता है और जिनसे प्रसन्न होता है।

ऐ अल्लाह, जिब्रील, मीकाईल और इस्राफ़ील के रब, आकाशों और धरती के पैदा करने वाले, गुप्त और प्रत्यक्ष के जानने वाले, तू अपने बंदों के बीच उनके मतभेदों का फैसला करता है। अपने आदेश से हमें उस सत्य का मार्ग दिखा जिसमें मतभेद किया गया है। निश्चय ही तू जिसे चाहता है सीधे मार्ग की ओर ले जाता है।

ऐ अल्लाह, मैं तेरा बंदा, तेरे बंदे का पुत्र और तेरी बंदी का पुत्र हूँ। मेरी पेशानी तेरे हाथ में है, मुझ पर तेरा आदेश लागू है और मेरा निर्णय करने में तू न्यायी है। मैं तेरे हर उस नाम के द्वारा माँगता हूँ जिससे तूने अपना नाम रखा, या अपनी किताब में उतारा, या अपनी सृष्टि में से किसी को सिखाया, या अपने पास परोक्ष के ज्ञान में रखा, कि तू कुरआन को मेरे दिल की बहार, मेरे सीने का नूर, मेरे दुख को दूर करने और मेरी चिंता मिटाने का कारण बना।

ऐ अल्लाह, मेरे दिल, सुनने और देखने में नूर रख; मेरे दाएँ, बाएँ, सामने, पीछे, ऊपर और नीचे नूर रख; मेरे लिए नूर बना और मेरा नूर महान कर।

ऐ अल्लाह, मुझे ज्ञान से समृद्ध कर, सहनशीलता से सजा, तक़वा से सम्मान दे और कुशलता से सुंदर बना।

اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ عِلْمَ الْخَائِفِينَ مِنْكَ ، وَخَوْفَ الْعَالِمِينَ بِكَ ، وَيَقِينَ الْمُتَوَكِّلِينَ عَلَيْكَ ، وَتَوَكُّلَ الْمُوقِنِينَ بِكَ ، وَإِنَابَةَ الْمُخْبِتِينَ إِلَيْكَ ، وَإِخْبَاتَ الْمُنِيبِينَ إِلَيْكَ ، وَشُكْرَ الصَّابِرِينَ لَكَ ، وَصَبْرَ الشَّاكِرِينَ لَكَ ، وَلَحَاقاً بِالْأَحْيَاءِ الْمَرْزُوقِينَ عِنْدَكَ.

اللَّهُمَّ اهْدِنِي وَسَدِّدْنِي ، اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ الْهُدَى وَالسَّدَادَ.

اللَّهُمَّ أَلْهِمْنِي رُشْدِي ، وَأَعِذْنِي مِنْ شَرِّ نَفْسِي.

اللَّهُمَّ انْفَعْنِي بِمَا عَلَّمْتَنِي ، وَعَلِّمْنِي مَا يَنْفَعُنِي ، وَزِدْنِي عِلْماً.

اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ عِلْماً نَافِعاً ، وَأَعُوذُ بِكَ مِنْ عِلْمٍ لَا يَنْفَعُ.

ऐ अल्लाह, मैं तुझसे डरने वालों जैसा ज्ञान, तुझे जानने वालों का डर, तुझ पर भरोसा करने वालों का यक़ीन, तुझ पर यक़ीन रखने वालों का भरोसा, तेरे सामने विनम्र रहने वालों की तेरी ओर वापसी, तेरी ओर लौटने वालों की विनम्रता, तेरे लिए धैर्य रखने वालों का शुक्र, तेरा शुक्र करने वालों का धैर्य और तेरे पास जीवित रोज़ी पाए जाने वालों से मिलना माँगता हूँ।

ऐ अल्लाह, मुझे मार्गदर्शन दे और सही राह पर स्थिर रख। ऐ अल्लाह, मैं तुझसे मार्गदर्शन और सही राह माँगता हूँ।

ऐ अल्लाह, मुझे सही समझ की प्रेरणा दे और मेरे मन की बुराई से बचा।

ऐ अल्लाह, जो तूने मुझे सिखाया उससे मुझे लाभ दे, मुझे वह सिखा जो मेरे लिए लाभदायक हो और मेरे ज्ञान में वृद्धि कर।

ऐ अल्लाह, मैं तुझसे लाभदायक ज्ञान माँगता हूँ और ऐसे ज्ञान से तेरी शरण माँगता हूँ जो लाभ न दे।

اللَّهُمَّ ثَبِّتْنِي وَاجْعَلْنِي هَادِياً مَهْدِيّاً.

اللَّهُمَّ لَكَ أَسْلَمْتُ ، وَبِكَ آمَنْتُ ، وَعَلَيْكَ تَوَكَّلْتُ ، وَإِلَيْكَ أَنَبْتُ ، وَبِكَ خَاصَمْتُ، أَعُوذُ بِعِزَّتِكَ ، لَا إِلَهَ إِلَّا أَنْتَ ، أَنْ تُضِلَّنِي ، أَنْتَ الْحَيُّ الَّذِي لَا يَمُوتُ ، وَالْجِنُّ وَالْإِنْسُ يَمُوتُونَ.

اللَّهُمَّ اهْدِنِي لِأَحْسَنِ الْأَخْلَاقِ لَا يَهْدِي لِأَحْسَنِهَا إِلَّا أَنْتَ ، وَاصْرِفْ عَنِّي سَيِّئَهَا لَا يَصْرِفُ عَنِّي سَيِّئَهَا إِلَّا أَنْتَ.

اللَّهُمَّ كَمَا أَحْسَنْتَ خَلْقِي فَأَحْسِنْ خُلُقِي.

اللَّهُمَّ فَالِقَ الْحَبِّ وَالنَّوَى ، وَمُخْرِجَ الْحَيِّ مِنَ الْمَيِّتِ وَمُخْرِجَ الْمَيِّتِ مِنَ الْحَيِّ ، فَالِقَ الْإِصْبَاحِ ، وَجَاعِلَ اللَّيْلِ سَكَنًا ، وَالشَّمْسَ وَالْقَمَرَ حُسْبَاناً ، يَا مَنْ جَعَلَ لَنَا النُّجُومَ لِنَهْتَدِيَ بِهَا فِي ظُلُمَاتِ الْبَرِّ وَالْبَحْرِ.

ऐ अल्लाह, मुझे स्थिर रख और मुझे मार्गदर्शन पाने वाला और दूसरों को मार्ग दिखाने वाला बना।

ऐ अल्लाह, मैंने तेरे सामने समर्पण किया, तुझ पर ईमान लाया, तुझ पर भरोसा किया, तेरी ओर लौटा और तेरी सहायता से विरोधियों का सामना किया। मैं तेरे सम्मान की शरण माँगता हूँ कि तू मुझे भटकने न दे; तेरे सिवा कोई इबादत के योग्य नहीं। तू सदा जीवित है, कभी नहीं मरता; जिन्न और मनुष्य मरते हैं।

ऐ अल्लाह, मुझे सबसे अच्छे आचरण का मार्ग दिखा, उसके सबसे अच्छे रूप की ओर तेरे सिवा कोई मार्गदर्शन नहीं देता; मेरे बुरे आचरण को दूर कर, उसे तेरे सिवा कोई दूर नहीं करता।

ऐ अल्लाह, जैसे तूने मेरी रचना अच्छी की है, वैसे ही मेरा आचरण अच्छा कर।

ऐ अल्लाह, दाने और गुठली को फाड़ने वाले, निर्जीव से जीवित और जीवित से निर्जीव निकालने वाले, सुबह को चीरने वाले, रात को विश्राम और सूर्य तथा चंद्रमा को गणना का साधन बनाने वाले, ऐ हमारे लिए तारे बनाने वाले ताकि हम थल और समुद्र के अँधेरों में उनसे रास्ता पाएँ।

اللَّهُمَّ جَلَّتْ قُدْرَتُكَ ، وَتَعَالَتْ حِكْمَتُكَ ، وَتَبَارَكَ اسْمُكَ ، وَتَعَالَى جَدُّكَ ، وَلَا إِلَهَ غَيْرُكَ.

اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ بِأَنَّ لَكَ الْحَمْدَ ، لَا إِلَهَ إِلَّا أَنْتَ ، الْمَنَّانُ ، بَدِيعُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ، ذُو الْجَلَالِ وَالْإِكْرَامِ ، يَا حَيُّ يَا قَيُّومُ.

اللَّهُمَّ ارْزُقْنَا رِزْقًا يَزِيدُنَا لَكَ شُكْراً ، وَإِلَيْكَ فَاقَةً وَفَقْراً ، وَبِكَ عَمَّنْ سِوَاكَ غِنًى.

اللَّهُمَّ اجْعَلْ أَوْسَعَ رِزْقِكَ عَلَيَّ عِنْدَ كِبَرِ سِنِّي ، وَانْقِطَاعِ عُمُرِي.

اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ مِنْ فَضْلِكَ وَرَحْمَتِكَ فَإِنَّهُ لَا يَمْلِكُهَا إِلَّا أَنْتَ.

ऐ अल्लाह, तेरी शक्ति महान है, तेरी बुद्धिमत्ता सर्वोच्च है, तेरा नाम बरकत वाला है, तेरी महिमा सर्वोच्च है और तेरे सिवा कोई इबादत के योग्य नहीं।

ऐ अल्लाह, मैं तुझसे माँगता हूँ क्योंकि सारी प्रशंसा तेरे लिए है। तेरे सिवा कोई इबादत के योग्य नहीं; तू बहुत अनुग्रह करने वाला, आकाशों और धरती का बेमिसाल स्रष्टा, महिमा और सम्मान वाला है। ऐ सदा जीवित, ऐ सबको संभालने वाले।

ऐ अल्लाह, हमें ऐसी रोज़ी दे जो तेरा शुक्र, तेरे प्रति हमारी आवश्यकता और तेरे द्वारा तेरे सिवा दूसरों से हमारी बेनियाज़ी बढ़ाए।

ऐ अल्लाह, मुझे अपनी सबसे अधिक रोज़ी वृद्धावस्था और जीवन के अंत में प्रदान कर।

ऐ अल्लाह, मैं तुझसे तेरा अनुग्रह और तेरी रहमत माँगता हूँ, क्योंकि तेरे सिवा उनका कोई स्वामी नहीं।

اللَّهُمَّ رَبِّ لَا تَذَرْنِي فَرْداً وَأَنْتَ خَيْرُ الْوَارِثِينَ.

اللَّهُمَّ رَبِّ هَبْ لِي مِنَ الصَّالِحِينَ.

اللَّهُمَّ قَنِّعْنِي بِمَا رَزَقْتَنِي ، وَبَارِكْ لِي فِيهِ ، وَاخْلُفْ عَلَيَّ كُلَّ غَائِبَةٍ لِي مِنْكَ بِخَيْرٍ.

اللَّهُمَّ رَبَّنَا هَبْ لَنَا مِنْ أَزْوَاجِنَا وَذُرِّيَّاتِنَا قُرَّةَ أَعْيُنٍ وَاجْعَلْنَا لِلْمُتَّقِينَ إِمَاماً.

اللَّهُمَّ يَا مَنْ تُسَبِّحُ لَهُ السَّمَاوَاتُ بِنُجُومِهَا وَأَبْرَاجِهَا ، وَالْأَرْضُ بِسُهُولِهَا وَفِجَاجِهَا ، وَالْبِحَارُ بِأَحْيَائِهَا وَأَمْوَاجِهَا ، وَالْجِبَالُ بِقِمَمِهَا وَأَوْتَادِهَا ، وَالْأَشْجَارُ بِفُرُوعِهَا وَثِمَارِهَا ، وَالسِّبَاعُ فِي فَلَوَاتِهَا ، وَالطَّيْرُ فِي وَكَنَاتِهَا ، يَا مَنْ تُسَبِّحُ لَهُ الذَّرَّاتُ عَلَى صِغَرِهَا ، وَالْمَجَرَّاتُ عَلَى كِبَرِهَا ، يَا مَنْ تُسَبِّحُ لَهُ السَّمَاوَاتُ السَّبْعُ وَالْأَرْضُ وَمَنْ فِيهِنَّ ، وَإِنْ مِنْ شَيْءٍ إِلَّا يُسَبِّحُ بِحَمْدِهِ.

ऐ अल्लाह, मेरे रब, मुझे अकेला न छोड़; तू सबसे अच्छा वारिस है।

ऐ अल्लाह, मेरे रब, मुझे नेक संतान प्रदान कर।

ऐ अल्लाह, जो रोज़ी तूने मुझे दी है उस पर मुझे संतुष्ट कर, उसमें बरकत दे और मेरी हर अनुपस्थित या खोई हुई चीज़ का अपनी ओर से अच्छा बदला दे।

ऐ अल्लाह, हमारे रब, हमें हमारे जीवनसाथियों और संतानों से आँखों की ठंडक दे और हमें तक़वा वालों का अगुआ बना।

ऐ अल्लाह, ऐ वह जिसकी तस्बीह आकाश अपने तारों और नक्षत्रों के साथ, धरती अपने मैदानों और दर्रों के साथ, समुद्र अपने जीवों और लहरों के साथ, पर्वत अपने शिखरों और खूंटों के साथ, पेड़ अपनी शाखाओं और फलों के साथ, जंगली जानवर अपने निर्जन प्रदेशों में और पक्षी अपने घोंसलों में करते हैं। ऐ वह जिसकी तस्बीह छोटे से छोटे कण और बड़ी से बड़ी आकाशगंगाएँ करती हैं; जिसकी तस्बीह सातों आकाश, धरती और उनमें रहने वाले करते हैं; कोई चीज़ ऐसी नहीं जो उसकी प्रशंसा के साथ तस्बीह न करती हो।

اللَّهُمَّ يَا مَنْ خَلَقَ الْأَرْضَ وَالسَّمَاوَاتِ الْعُلَى ، يَا رَحْمَاناً عَلَى الْعَرْشِ اسْتَوَى ، يَا مَنْ لَهُ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ وَمَا بَيْنَهُمَا ، وَمَا تَحْتَ الثَّرَى ، يَا مَنْ يَعْلَمُ السِّرَ وَأَخْفَى، يَا مَنْ لَهُ الْأَسْمَاءُ الْحُسْنَى ، يَا مَنْ مَعَ عِبَادِهِ يَسْمَعُ وَيَرَى ، يَا مَنْ أَعْطَى كُلَّ شَيْءٍ خَلْقَهُ ثُمَّ هَدَى.

اللَّهُمَّ أَنْتَ الْبَادِئُ بِالْإِحْسَانِ مِنْ قَبْلِ تَوَجُّهِ الْعَابِدِينَ ، وَأَنْتَ الْبَادِئُ بِالْعَطَايَا قَبْلَ طَلَبِ الطَّالِبِينَ وَأَنْتَ الْوَهَّابُ.

اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ الْجَنَّةَ وَمَا قَرَّبَ إِلَيْهَا مِنْ قَوْلٍ وَعَمَلٍ ، وَأَعُوذُ بِكَ مِنَ النَّارِ وَمَا قَرَّبَ إِلَيْهَا مِنْ قَوْلٍ وَعَمَلٍ.

اللَّهُمَّ رَبِّ ابْنِ لِي عِنْدَكَ بَيْتاً فِي الْجَنَّةِ.

اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ رِضَاكَ وَالْجَنَّةَ ، وَأَعُوذُ بِكَ مِنْ سَخَطِكَ وَالنَّارِ.

ऐ अल्लाह, ऐ धरती और ऊँचे आकाशों को पैदा करने वाले; ऐ अत्यंत दयावान जिसने अर्श पर इस्तिवा फ़रमाया; ऐ उस हस्ती जिसके लिए है जो आकाशों और धरती में, उनके बीच और मिट्टी के नीचे है; ऐ गुप्त और उससे भी अधिक छिपी बात जानने वाले; ऐ सुंदर नामों वाले; ऐ अपने बंदों के साथ सुनने और देखने वाले; ऐ हर चीज़ को उसकी रचना देने और फिर मार्ग दिखाने वाले।

ऐ अल्लाह, तू इबादत करने वालों के तेरी ओर मुड़ने से पहले ही उपकार शुरू करता है और माँगने वालों के माँगने से पहले ही दान देता है; तू बहुत देने वाला है।

ऐ अल्लाह, मैं तुझसे जन्नत और उस तक निकट करने वाली बात तथा कर्म माँगता हूँ, और आग तथा उस तक निकट करने वाली बात और कर्म से तेरी शरण माँगता हूँ।

ऐ अल्लाह, मेरे रब, मेरे लिए अपने पास जन्नत में एक घर बना।

ऐ अल्लाह, मैं तुझसे तेरी प्रसन्नता और जन्नत माँगता हूँ और तेरी नाराज़गी तथा आग से तेरी शरण माँगता हूँ।

اللَّهُمَّ أَحْسِنْ عَاقِبَتَنَا فِي الْأُمُورِ كُلِّهَا ، وَأَجِرْنَا مِنْ خِزْيِ الدُّنْيَا وَعَذَابِ الْآخِرَةِ.

اللَّهُمَّ رَبَّنَا اصْرِفْ عَنَّا عَذَابَ جَهَنَّمَ إِنَّ عَذَابَهَا كَانَ غَرَاماً.

اللَّهُمَّ رَبَّنَا إِنَّنَا آمَنَّا فَاغْفِرْ لَنَا ذُنُوبَنَا وَقِنَا عَذَابَ النَّارِ.

اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ الْجَنَّةَ ، وَأَسْتَجِيرُ بِكَ مِنَ النَّارِ.

اللَّهُمَّ رَبَّنَا وَآتِنَا مَا وَعَدْتَنَا عَلَى رُسِلِكَ وَلَا تُخْزِنَا يَوْمَ الْقِيَامَةِ إِنَّكَ لَا تُخْلِفُ الْمِيعَادَ.

ऐ अल्लाह, हमारे सभी मामलों का परिणाम अच्छा कर और हमें दुनिया के अपमान और आख़िरत की यातना से बचा।

ऐ अल्लाह, हमारे रब, हमसे जहन्नम की यातना दूर कर; निश्चय ही उसकी यातना लगातार बनी रहने वाली है।

ऐ अल्लाह, हमारे रब, हम ईमान लाए हैं, अतः हमारे पाप क्षमा कर और हमें आग की यातना से बचा।

ऐ अल्लाह, मैं तुझसे जन्नत माँगता हूँ और आग से तेरी शरण चाहता हूँ।

ऐ अल्लाह, हमारे रब, हमें वह प्रदान कर जिसका तूने अपने रसूलों के माध्यम से वादा किया है और क़ियामत के दिन हमें अपमानित न कर; निश्चय ही तू वादा नहीं तोड़ता।

اللَّهُمَّ حَاسِبْنِي حِسَاباً يَسِيراً.

اللَّهُمَّ إِنَّا نَعُوذُ بِكَ أَنْ نُشْرِكَ بِكَ شَيْئاً نَعْلَمُهُ ، وَنَسْتَغْفِرُكَ لِمَا لَا نَعْلَمُهُ.

اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنْ جَهْدِ الْبَلَاءِ ، وَدَرَكِ الشَّقَاءِ ، وَسُوءِ الْقَضَاءِ ، وَشَمَاتَةِ الْأَعْدَاءِ ، يَا سَمِيعَ الدُّعَاءِ.

اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنْ عَذَابِ جَهَنَّمَ ، وَمِنْ عَذَابِ الْقَبْرِ ، وَمِنْ فِتْنَةِ الْمَحْيَا وَالْمَمَاتِ ، وَمِنْ فِتْنَةِ الْمَسِيحِ الدَّجَّالِ ، وَأَعُوذُ بِكَ مِنَ الْمَأْثَمِ وَالْمَغْرَمِ.

اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنْ فِتْنَةِ النَّارِ وَعَذَابِ النَّارِ ، وَفِتْنَةِ الْقَبْرِ ، وَعَذَابِ الْقَبْرِ ، وَشَرِّ فِتْنَةِ الْغِنَى ، وَشَرِّ فِتْنَةِ الْفَقْرِ ، اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنْ شَرِّ فِتْنَةِ الْمَسِيحِ الدَّجَّالِ.

ऐ अल्लाह, मेरा हिसाब आसान कर।

ऐ अल्लाह, हम जानबूझकर किसी को तेरा साझी बनाने से तेरी शरण माँगते हैं और जो हम नहीं जानते उसके लिए तुझसे क्षमा माँगते हैं।

ऐ अल्लाह, मैं कठिन परीक्षा, दुर्भाग्य में पड़ने, बुरे फैसले और शत्रुओं की प्रसन्नता से तेरी शरण माँगता हूँ, ऐ दुआ सुनने वाले।

ऐ अल्लाह, मैं जहन्नम की यातना, क़ब्र की यातना, जीवन और मृत्यु की परीक्षा और मसीह दज्जाल की परीक्षा से तेरी शरण माँगता हूँ; और पाप तथा कर्ज़ से तेरी शरण माँगता हूँ।

ऐ अल्लाह, मैं आग की परीक्षा और आग की यातना, क़ब्र की परीक्षा और क़ब्र की यातना, धन की परीक्षा की बुराई और ग़रीबी की परीक्षा की बुराई से तेरी शरण माँगता हूँ। ऐ अल्लाह, मैं मसीह दज्जाल की परीक्षा की बुराई से तेरी शरण माँगता हूँ।

اللَّهُمَّ اغْسِلْ قَلْبِي بِمَاءِ الثَّلْجِ وَالْبَرَدِ ، وَنَقِّ قَلْبِيَ مِنْ الْخَطَايَا كَمَا نَقَّيْتَ الثَّوْبَ الْأَبْيَضَ مِنَ الدَّنَسِ ، وَبَاعِدْ بَيْنِي وَبَيْنَ خَطَايَايَ كَمَا بَاعَدْتَ بَيْنَ الْمَشْرِقِ وَالْمَغْرِبِ.

اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنَ الْكَسَلِ وَالْمَأْثَمِ وَالْمَغْرَمِ.

اللَّهُمَّ رَبَّ جِبْرَائِيلَ ، وَمِيكَائِيلَ ، وَرَبَّ إِسْرَافِيلَ ، أَعُوذُ بِكَ مِنْ حَرِّ النَّارِ وَمِنْ عَذَابِ الْقَبْرِ.

اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنْ جَارِ السُّوءِ فِي دَارِ الْمُقَامَةِ ، فَإِنَّ جَارَ الْبَادِيَةِ يَتَحَوَّلُ.

اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنَ الْعَجْزِ وَالْكَسَلِ ، وَالْجُبْنِ وَالْبُخْلِ ، وَالْهَرَمِ وَالْقَسْوَةِ ، وَالْغَفْلَةِ وَالْعَيْلَةِ وَالذِّلَّةِ ، وَالْمَسْكَنَةِ ، وَأَعُوذُ بِكَ مِنَ الْفَقْرِ وَالْكُفْرِ ، وَالْفُسُوقِ وَالشِّقَاقِ وَالنِّفَاقِ، وَالسُّمْعَةِ وَالرِّيَاءِ ، وَأَعُوذُ بِكَ مِنَ الصَّمَمِ وَالْبَكَمِ ، وَالْجُنُونِ ، وَالْجِذَامِ ، وَالْبَرَصِ ، وَسَيِّئِ الْأَسْقَامِ.

ऐ अल्लाह, मेरे दिल को बर्फ़ और ओलों के पानी से धो और मेरे दिल को पापों से ऐसे साफ़ कर जैसे तूने सफ़ेद कपड़े को मैल से साफ़ किया। मेरे और मेरे पापों के बीच उतनी दूरी कर दे जितनी पूर्व और पश्चिम के बीच की है।

ऐ अल्लाह, मैं आलस्य, पाप और कर्ज़ से तेरी शरण माँगता हूँ।

ऐ अल्लाह, जिब्रील, मीकाईल और इस्राफ़ील के रब, मैं आग की गर्मी और क़ब्र की यातना से तेरी शरण माँगता हूँ।

ऐ अल्लाह, मैं स्थायी निवास में बुरे पड़ोसी से तेरी शरण माँगता हूँ, क्योंकि रेगिस्तान का पड़ोसी स्थान बदल लेता है।

ऐ अल्लाह, मैं असमर्थता, आलस्य, कायरता, कंजूसी, वृद्धावस्था की दुर्बलता, कठोरता, लापरवाही, अभाव, अपमान और दीनता से तेरी शरण माँगता हूँ। मैं ग़रीबी, कुफ़्र, पापाचार, फूट, पाखंड, शोहरत की चाह और दिखावे से तेरी शरण माँगता हूँ। मैं बहरापन, गूँगापन, पागलपन, कुष्ठ, सफ़ेद दाग और गंभीर बीमारियों से तेरी शरण माँगता हूँ।

اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنَ الْعَجْزِ وَالْكَسَلِ ، وَالْجُبْنِ ، وَالْبُخْلِ ، وَالْهَرَمِ ، وَعَذَابِ الْقَبْرِ، اللَّهُمَّ آتِ نَفْسِي تَقْوَاهَا ، وَزَكِّهَا أَنْتَ خَيْرُ مَنْ زَكَّاهَا ، أَنْتَ وَلِيُّهَا وَمَوْلَاهَا.

اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنْ عِلْمٍ لَا يَنْفَعُ ، وَمِنْ قَلْبٍ لَا يَخْشَعُ ، وَمِنْ نَفْسٍ لَا تَشْبَعُ ، وَمِنْ دَعْوَةٍ لَا يُسْتَجَابُ لَهَا.

اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنْ مُنْكَرَاتِ الْأَخْلَاقِ وَالْأَعْمَالِ وَالْأَهْوَاءِ وَالْأَدْوَاءِ.

اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ أَنْ تُحَسِّنَ فِي لَوَائِحِ الْعُيُونِ عَلَانِيَتِي ، وَتُقَبِّحَ فِي خَفِيَّاتِ الْعُيُونِ سَرِيرَتِي ، اللَّهُمَّ كَمَا أَسَأْتُ وَأَحْسَنْتَ إِلَيَّ ، فَإِذَا عُدْتُ فَعُدْ عَلَيَّ.

اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنْ شَرِّ سَمْعِي ، وَمِنْ شَرِّ بَصَرِي ، وَمِنْ شَرِّ لِسَانِي ، وَمِنْ شَرِّ قَلْبِي ، وَمِنْ شَرِّ مَنِيِّي.

ऐ अल्लाह, मैं असमर्थता, आलस्य, कायरता, कंजूसी, वृद्धावस्था की दुर्बलता और क़ब्र की यातना से तेरी शरण माँगता हूँ। ऐ अल्लाह, मेरे मन को तक़वा दे और उसे पवित्र कर; तू सबसे अच्छा पवित्र करने वाला है, तू उसका संरक्षक और स्वामी है।

ऐ अल्लाह, मैं ऐसे ज्ञान से जो लाभ न दे, ऐसे दिल से जो विनम्र न हो, ऐसे मन से जो तृप्त न हो और ऐसी दुआ से जो स्वीकार न हो, तेरी शरण माँगता हूँ।

ऐ अल्लाह, मैं बुरे आचरण, कर्मों, इच्छाओं और रोगों से तेरी शरण माँगता हूँ।

ऐ अल्लाह, मैं इससे तेरी शरण माँगता हूँ कि लोगों की नज़रों के सामने मेरा बाहरी रूप अच्छा हो और नज़रों से छिपा मेरा भीतरी हाल बुरा हो। ऐ अल्लाह, जैसे मैंने बुराई की और तूने मुझसे भलाई की, वैसे जब मैं लौटूँ तो तू भी मुझ पर फिर अनुग्रह कर।

ऐ अल्लाह, मैं अपने सुनने, देखने, ज़बान, दिल और अपनी कामेच्छा की बुराई से तेरी शरण माँगता हूँ।

اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ أَنْ أَقُولَ زُوراً ، أَوْ أَغْشَى فُجُوراً ، أَوْ أَكُونَ بِكَ مَغْرُوراً.

اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنَ الشِّقَاقِ وَالنِّفَاقِ ، وَسُوءِ الْأَخْلَاقِ.

اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِرِضَاكَ مِنْ سَخَطِكَ ، وَبِمُعَافَاتِكَ مِنْ عُقُوبَتِكَ ، وَبِكَ مِنْكَ ، لَا أُحْصِي ثَنَاءً عَلَيْكَ ، أَنْتَ كَمَا أَثْنَيْتَ عَلَى نَفْسِكَ.

اللَّهُمَّ رَبَّ السَّمَاوَاتِ السَّبْعِ وَرَبَّ الْأَرْضِ ، وَرَبَّ الْعَرْشِ الْعَظِيمِ ، رَبَّنَا وَرَبَّ كُلِّ شَيْءٍ ، فَالِقَ الْحَبِّ وَالنَّوَى ، وَمُنَزِّلَ التَّوْرَاةِ وَالْإِنْجِيلِ وَالْفُرْقَانَ ، أَعُوذُ بِكَ مِنْ شَرِّ كُلِّ شَيْءٍ أَنْتَ آخِذٌ بِنَاصِيَتِهِ ، اللَّهُمَّ أَنْتَ الْأَوَّلُ فَلَيْسَ قَبْلَكَ شَيءٌ ، وَأَنْتَ الْآخِرُ فَلَيْسَ بَعْدَكَ شَيءٌ ، وَأَنْتَ الظَّاهِرُ فَلَيْسَ فَوْقَكَ شَيءٌ ، اقْضِ عَنَّا الدَّيْنَ وَأَغْنِنَا مِنَ الْفَقْرِ.

اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنْ غَلَبَةِ الدَّيْنِ ، وَغَلَبَةِ الْعَدُوِّ ، وَشَمَاتَةِ الْأَعْدَاءِ.

ऐ अल्लाह, मैं झूठ बोलने, पाप करने और तेरे बारे में धोखे में पड़ने से तेरी शरण माँगता हूँ।

ऐ अल्लाह, मैं फूट, पाखंड और बुरे आचरण से तेरी शरण माँगता हूँ।

ऐ अल्लाह, मैं तेरी प्रसन्नता के द्वारा तेरी नाराज़गी से, तेरी दी हुई कुशलता के द्वारा तेरी सज़ा से और तेरे द्वारा तुझसे शरण माँगता हूँ। मैं तेरी प्रशंसा की गणना नहीं कर सकता; तू वैसा ही है जैसी तूने अपनी प्रशंसा की है।

ऐ अल्लाह, सात आकाशों और धरती के रब, महान अर्श के रब, हमारे रब और हर चीज़ के रब, दाने और गुठली को फाड़ने वाले, तौरेत, इंजील और फ़ुरक़ान उतारने वाले; मैं हर उस चीज़ की बुराई से तेरी शरण माँगता हूँ जिसकी पेशानी तेरे अधिकार में है। ऐ अल्लाह, तू पहला है, तुझसे पहले कुछ नहीं; तू अंतिम है, तेरे बाद कुछ नहीं; तू ज़ाहिर है, तेरे ऊपर कुछ नहीं। हमारा कर्ज़ चुका दे और हमें ग़रीबी से बेनियाज़ कर।

ऐ अल्लाह, मैं कर्ज़ के दबाव, शत्रु के प्रभुत्व और शत्रुओं के खुश होने से तेरी शरण माँगता हूँ।

اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنَ الْفَقْرِ وَالْقِلَّةِ وَالذِّلَّةِ ، وَأَعُوذُ بِكَ مِنْ أَنْ أَظْلِمَ أَوْ أُظْلَمَ.

اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنْ شَرِّ فِتْنَةِ الْغِنَى ، وَمِنْ شَرِّ فِتْنَةِ الْفَقْرِ.

اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنْ زَوَالِ نِعْمَتِكَ ، وَتَحَوُّلِ عَافِيَتِكَ ، وَفُجَاءَةِ نِقْمَتِكَ ، وَجَمِيعِ سَخَطِكَ.

اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنْ يَوْمِ السُّوءِ ، وَمِنْ لَيْلَةِ السُّوءِ ، وَمِنْ سَاعَةِ السُّوءِ ، وَمِنْ صَاحِبِ السُّوءِ ، وَمِنْ جَارِ السُّوءِ ، فِي دَارِ الْمُقَامَةِ.

اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنْ قَلْبٍ لَا يَخْشَعُ ، وَمِنْ دُعَاءٍ لَا يُسْمَعُ ، وَمِنْ نَفْسٍ لَا تَشْبَعُ ، وَمِنْ عِلْمٍ لَا يَنْفَعُ ، أَعُوذُ بِكَ مِنْ هَؤُلَاءِ الْأَرْبَعِ.

ऐ अल्लाह, मैं ग़रीबी, कमी और अपमान से तेरी शरण माँगता हूँ, और इससे भी कि मैं किसी पर अत्याचार करूँ या मुझ पर अत्याचार किया जाए।

ऐ अल्लाह, मैं धन की परीक्षा की बुराई और ग़रीबी की परीक्षा की बुराई से तेरी शरण माँगता हूँ।

ऐ अल्लाह, मैं तेरी नेमत के छिन जाने, तेरी दी हुई कुशलता के बदल जाने, तेरी अचानक पकड़ और तेरी हर नाराज़गी से तेरी शरण माँगता हूँ।

ऐ अल्लाह, मैं बुरे दिन, बुरी रात, बुरी घड़ी, बुरे साथी और स्थायी निवास में बुरे पड़ोसी से तेरी शरण माँगता हूँ।

ऐ अल्लाह, मैं ऐसे दिल से जो विनम्र न हो, ऐसी दुआ से जो सुनी न जाए, ऐसे मन से जो तृप्त न हो और ऐसे ज्ञान से जो लाभ न दे, तेरी शरण माँगता हूँ; इन चारों से तेरी शरण माँगता हूँ।

اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنَ التَّرَدِّي ، وَالْهَدْمِ ، وَالْغَرَقِ ، وَالْحَرْقِ وَأَعُوذُ بِكَ أَنْ يَتَخَبَّطَنِي الشَّيْطَانُ عِنْدَ الْمَوْتِ ، وَأَعُوذُ بِكَ مِنْ أَنْ أَمُوتَ فِي سَبِيلِكَ مُدْبِراً ، وَأَعُوذُ بِكَ أَنْ أَمُوتَ لَدِيغاً.

اللَّهُمَّ رَبِّ أَعُوذُ بِكَ مِنْ هَمَزَاتِ الشَّيَاطِينِ ، وَأَعُوذُ بِكَ رَبِّ أَنْ يَحْضُرُونَ.

اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنْ شَرِّ الْأَشْرَارِ ، وَمِنْ كَيْدِ الْفُجَّارِ ، ومِنْ طَوَارِقِ اللَّيْلِ وَالنَّهَارِ إِلَّا طَارِقًا يَطْرُقُ بِخَيْرٍ يَا رَحْمَنُ.

اللَّهُمَّ رَبِّ أَعُوذُ بِكَ مِنْ أَعْيُنِ الْعَائِنِينَ ، وَمِنْ سِحْرِ السَّاحِرِينَ ، وَمِنْ شَرِّ كُلِّ ذِي شَرٍّ.

اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنَ الْجُوعِ ، فَإِنَّهُ بِئْسَ الضَّجِيعُ ، وَأَعُوذُ بِكَ مِنْ الْخِيَانَةِ ، فَإِنَّهَا بِئْسَتِ الْبِطَانَةُ.

ऐ अल्लाह, मैं ऊँचाई से गिरने, मलबे में दबने, डूबने और जलने से तेरी शरण माँगता हूँ। मृत्यु के समय शैतान के बहकाने से, तेरी राह में पीठ फेरकर मरने से और डसकर मारे जाने से तेरी शरण माँगता हूँ।

ऐ अल्लाह, मेरे रब, मैं शैतानों के उकसावे से तेरी शरण माँगता हूँ और ऐ मेरे रब, उनके मेरे पास आने से तेरी शरण माँगता हूँ।

ऐ अल्लाह, मैं दुष्टों की बुराई, पापियों की चाल और रात व दिन में अचानक आने वाली हर चीज़ से तेरी शरण माँगता हूँ, सिवाय उसके जो भलाई लेकर आए, ऐ अत्यंत दयावान।

ऐ अल्लाह, मेरे रब, मैं बुरी नज़र लगाने वालों की नज़रों, जादू करने वालों के जादू और हर बुराई वाले की बुराई से तेरी शरण माँगता हूँ।

ऐ अल्लाह, मैं भूख से तेरी शरण माँगता हूँ, क्योंकि वह बुरा साथी है; और विश्वासघात से तेरी शरण माँगता हूँ, क्योंकि वह बुरा अंतरंग साथी है।

اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنْ عُقُوقِ الْأَبْنَاءِ ، وَمِنْ قَطِيعَةِ الْأَقْرِبَاءِ ، وَمِنْ جَفْوَةِ الْأَحْيَاءِ ، وَمِنْ تَغَيُّرِ الْأَصْدِقَاءِ ، وَمِنْ شَمَاتَةِ الْأَعْدَاءِ.

اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنْ أَنْ أَزِلَّ أَوْ أُزَلَّ ، أَوْ أَضِلَّ أَوْ أُضَلَّ ، أَوْ أَظْلِمَ أَوْ أُظْلَمَ ، أَوْ أَجْهَلَ أَوْ يُجْهَلَ عَلَيَّ.

اللَّهُمَّ إِنَّا نَسْتَعِينُكَ وَنَسْتَهْدِيكَ، وَنَسْتَغْفِرُكَ وَنَتُوبُ إِلَيْكَ وَنُؤْمِنُ بِكَ ، وَنَتَوَكَّلُ عَلَيْكَ ، وَنُثْنِي عَلَيْكَ الْخَيْرَ كُلَّهُ ، نَشْكُرُكَ وَلَا نَكْفُرُكَ ، وَنَخْلَعُ وَنَتْرُكُ مَنْ يَفْجُرُكَ ، اللَّهُمَّ إِيَّاكَ نَعْبُدُ ، وَلَكَ نُصَلِّي وَنَسْجُدُ ، وَإِلَيكَ نَسْعَى وَنَحْفِدُ ، نَرْجُو رَحْمَتَكَ ، وَنَخْشَى عَذَابَكَ ، إِنَّ عَذَابَكَ الْجِدَّ بِالْكُفَّارِ مُلْحِقٌ.

اللَّهُمَّ رَبَّنَا أَعِزَّنَا بِالْإِسْلَامِ ، وَأَعِزَّ بِنَا الْإِسْلَامَ ، اللَّهُمَّ أَعْلِ بِنَا كَلِمَةَ الْإِسْلَامِ ، وَارْفَعْ بِنَا رَايَةَ الْقُرْآنِ.

اللَّهُمَّ مُنْزِلَ الْكِتَابِ ، وَمُجْرِيَ السَّحَابِ وَهَازِمَ الْأَحْزَابِ ، عَالِمَ الْغَيْبِ وَالشَّهَادَةِ أَسْأَلُكَ بِاسْمِكَ الْأَعْظَمِ الَّذِي إِذَا دُعِيتَ بِهِ أَجَبْتَ وَإِذَا سُئِلْتَ بِهِ أَعْطَيْتَ.

ऐ अल्लाह, मैं संतानों की अवज्ञा, रिश्तेदारों के संबंध तोड़ने, जीवित लोगों के रूखे व्यवहार, दोस्तों के बदल जाने और शत्रुओं के खुश होने से तेरी शरण माँगता हूँ।

ऐ अल्लाह, मैं फिसलने या फिसलाए जाने, भटकने या भटकाए जाने, अत्याचार करने या मुझ पर अत्याचार होने और अज्ञानता का व्यवहार करने या मेरे साथ अज्ञानता का व्यवहार किए जाने से तेरी शरण माँगता हूँ।

ऐ अल्लाह, हम तुझसे सहायता और मार्गदर्शन माँगते हैं, तुझसे क्षमा माँगते और तेरी ओर तौबा करते हैं; हम तुझ पर ईमान लाते और भरोसा करते हैं, तेरी सभी अच्छी प्रशंसा करते हैं, तेरा शुक्र अदा करते और तेरा इनकार नहीं करते, और तेरी अवज्ञा करने वाले को छोड़ते और उससे अलग होते हैं। ऐ अल्लाह, हम केवल तेरी इबादत करते हैं, तेरे लिए नमाज़ पढ़ते और सज्दा करते हैं, और तेरी ही ओर प्रयास और दौड़ करते हैं। हम तेरी रहमत की आशा और तेरी यातना का भय रखते हैं। निश्चय ही तेरी वास्तविक यातना इनकार करने वालों को पहुँचने वाली है।

ऐ अल्लाह, हमारे रब, हमें इस्लाम से सम्मान दे और हमारे माध्यम से इस्लाम को सम्मान दे। ऐ अल्लाह, हमारे माध्यम से इस्लाम का कलिमा ऊँचा कर और कुरआन का झंडा उठा।

ऐ अल्लाह, किताब उतारने वाले, बादलों को चलाने वाले, दलों को पराजित करने वाले, गुप्त और प्रत्यक्ष के जानने वाले, मैं तुझसे तेरे उस महानतम नाम के द्वारा माँगता हूँ कि जब उसके द्वारा तुझे पुकारा जाए तो तू उत्तर देता है और जब माँगा जाए तो तू प्रदान करता है।

اللَّهُمَّ يَا حَيُّ يَا قَيُّومُ ، يَا حَيُّ يَا قَيُّومُ ، يَا حَيُّ يَا قَيُّومُ ، اللَّهُمَّ أَظِلَّنِي فِي ظِلِّ عَرْشِكَ يَوْمَ لَا ظِلَّ إِلَّا ظِلُّكَ.

اللَّهُمَّ أَظْهِرْ دِينَكَ عَلَى الدِّينِ كُلِّهُ وَلَوْ كَرِهَ الْمُشْرِكُونَ.

اللَّهُمَّ يَا مَنْ يُجِيبُ الْمُضْطَرَّ إِذَا دَعَاهُ ، وَيَكْشِفُ السُّوءَ ، اكْشِفِ السُّوءَ عَنْ إِخْوَانِنَا الْأُسَارَى وَالْمَسْجُونِينَ وَالْمُعْتَقَلِينَ ، اللَّهُمَّ افْكُكْ بِقُوَّتِكَ أَسْرَهُمْ ، وَاجْبُرْ بِرَحْمَتِكَ كَسْرَهُمْ ، وَتَوَلَّ بِعِنَايَتِكَ أَمْرَهُمْ ، وَرُدَّهُمْ إِلَى أَهْلِيهِمْ سَالِمِينَ غَانِمِينَ.

اللَّهُمَّ كُنْ لِلْمُسْلِمِينَ وَالْمُسْتَضْعَفِينَ فِي كُلِّ مَكَانٍ ؛ فَرِّجْ هَمَّهُمْ ، وَنَفِّسْ كَرْبَهُمْ ، وَأَقِلْ عَثْرَتَهُمْ وَتَوَلَّ بِنَفْسِكَ أَمْرَهُمْ.

اللَّهُمَّ ارْفَعْ رَايَتَهُمْ ، وَاكْبِتْ عَدُوَّهُمْ.

ऐ अल्लाह, ऐ सदा जीवित, ऐ सबको संभालने वाले; ऐ सदा जीवित, ऐ सबको संभालने वाले; ऐ सदा जीवित, ऐ सबको संभालने वाले। ऐ अल्लाह, जिस दिन तेरी छाया के सिवा कोई छाया न होगी, उस दिन मुझे अपने अर्श की छाया में स्थान दे।

ऐ अल्लाह, अपने दीन को सभी दीनों पर प्रबल कर, भले ही बहुदेववादियों को नापसंद हो।

ऐ अल्लाह, ऐ पुकारने पर विवश व्यक्ति की पुकार सुनने और कष्ट दूर करने वाले, हमारे बंदी और कैद भाइयों से कष्ट दूर कर। ऐ अल्लाह, अपनी शक्ति से उनकी कैद खोल दे, अपनी दया से उनकी टूटन दूर कर, उनकी देखभाल कर और उन्हें सलामत तथा सफल होकर उनके परिवारों के पास लौटा।

ऐ अल्लाह, हर जगह मुसलमानों और कमज़ोर बनाए गए लोगों का सहायक हो; उनकी चिंता दूर कर, उनका संकट कम कर, उनकी चूक माफ़ कर और स्वयं उनके मामलों की देखभाल कर।

ऐ अल्लाह, उनका झंडा ऊँचा कर और उनके शत्रु को पराजित कर।

اللَّهُمَّ وَحِّدْ صَفَّهُمْ ، وَاجْمَعْ كَلِمَتَهُمْ ، وَرُدَّهُمْ إِلَيْكَ رَدَّاً جَمِيلاً.

اللَّهُمَّ لَا أَبَرَّ بِهِمْ مِنْكَ ، وَلَا أَرْحَمَ بِهِمْ مِنْكَ، وَلَا أَرْأَفَ بِهِمْ مِنْكَ.. اللَّهُمَّ هُمْ مِنْكَ وَإِلَيكَ.. اللَّهُمَّ فَاجْعَلِ الدَّائِرَةَ لَهُمْ لَا عَلَيْهِمْ وَالنَّصْرَ حَلِيفَهُمْ.. يَا رَبِّ.

اللَّهُمَّ يَا خَيْرَ مَنْ سُئِلَ ، وَأَجْوَدَ مَنْ أَعْطَى ، وَأَكْرَمَ مَنْ عَفَا ، وَأَعْظَمَ مَنْ غَفَرَ ، وَأَعْدَلَ مَنْ حَكَمَ ، وَأَصْدَقَ مَنْ حَدَّثَ ، وَأَوْفَى مَنْ وَعَدَ ، وَأَبْصَرَ مَنْ رَاقَبَ ، وَأَسْرَعَ مَنْ حَاسَبَ ، وَأَرْحَمَ مَنْ عَاقَبَ ، وَأَحْسَنَ مَنْ خَلَقَ ، وَأَحْكَمَ مَنْ شَرَعَ ، وَأَحَقَّ مَنْ عُبِدَ ، وَأَوْلَى مَنْ دُعِيَ ، وَأَبَرَّ مَنْ أَجَابَ.

اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ خَيْرَ الْمَسْأَلَةِ ، وَخَيْرَ الدُّعَاءِ ، وَخَيْرَ النَّجَاحِ ، وَخَيْرَ الْعَمَلِ ، وَخَيْرَ الثَّوَابِ ، وَخَيْرَ الْحَيَاةِ ، وَخَيْرَ الْمَمَاتِ ، وَثَبِّتْنِي ، وَثَقِّلْ مَوَازِينِي ، وَحَقِّقْ إِيمَانِي ، وَارْفَعْ دَرَجَاتِي ، وَتَقَبَّلْ صَلَاتِي ، وَاغْفِرْ خَطِيئَتِي ، وَأَسْأَلُكَ الدَّرَجَاتِ الْعُلَى مِنَ الْجَنَّةِ.

اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ فَوَاتِحَ الْخَيْرِ ، وَخَوَاتِمَهُ ، وَجَوَامِعَهُ ، وَأَوَّلَهُ ، وَظَاهِرَهُ ، وَبَاطِنَهُ ، وَالدَّرَجَاتِ الْعُلَى مِنَ الْجَنَّةِ آمِينَ.

ऐ अल्लाह, उनकी पंक्तियाँ एक कर, उनकी बात को एकजुट कर और उन्हें सुंदर ढंग से अपनी ओर लौटा।

ऐ अल्लाह, उनके साथ तुझसे अधिक भलाई करने वाला, तुझसे अधिक दयालु और तुझसे अधिक करुणामय कोई नहीं। ऐ अल्लाह, वे तेरी ओर से हैं और तेरी ही ओर लौटेंगे। ऐ अल्लाह, परिणाम उनके पक्ष में कर, उनके विरुद्ध नहीं, और विजय को उनका साथी बना, ऐ मेरे रब।

ऐ अल्लाह, ऐ सबसे अच्छे माँगे जाने वाले, सबसे उदार दाता, सबसे उदार क्षमा करने वाले, सबसे महान माफ़ करने वाले, सबसे न्यायी निर्णय करने वाले, सबसे सच्ची बात कहने वाले, सबसे वादा निभाने वाले, सबसे अधिक देखने वाले निगरानीकर्ता, सबसे शीघ्र हिसाब लेने वाले, सज़ा देने वालों में सबसे दयालु, सबसे अच्छा पैदा करने वाले, सबसे बुद्धिमत्ता से विधान बनाने वाले, इबादत के सबसे अधिक हक़दार, पुकारे जाने के सबसे योग्य और उत्तर देने में सबसे अधिक कृपालु।

ऐ अल्लाह, मैं तुझसे उत्तम याचना, उत्तम दुआ, उत्तम सफलता, उत्तम कर्म, उत्तम प्रतिफल, उत्तम जीवन और उत्तम मृत्यु माँगता हूँ। मुझे स्थिर रख, मेरे कर्मों के पलड़े भारी कर, मेरे ईमान को सच्चा कर, मेरे दर्जे ऊँचे कर, मेरी नमाज़ स्वीकार कर और मेरी गलती क्षमा कर। मैं तुझसे जन्नत के ऊँचे दर्जे माँगता हूँ।

ऐ अल्लाह, मैं तुझसे भलाई के आरंभ, उसके अंत, उसकी समग्रता, उसके पहले, उसके प्रकट और उसके छिपे रूप तथा जन्नत के ऊँचे दर्जे माँगता हूँ। आमीन।

اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ خَيْرَ مَا آتِي ، وَخَيْرَ مَا أَفْعَلُ ، وَخَيْرَ مَا أَعْمَلُ ، وَخَيْرَ مَا بَطَنَ ، وَخَيْرَ مَا ظَهَرَ ، وَالدَّرَجَاتِ الْعُلَى مِنَ الْجَنَّةِ آمِينَ.

اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ أَنْ تَرْفَعَ ذِكْرِي ، وَتَضَعَ وِزْرِيَ ، وَتُصْلِحَ أَمْرِيَ ، وَتُطَهِّرَ قَلْبِيَ ، وَتُحَصِّنَ فَرْجِيَ ، وَتُنَوِّرَ قَلْبِيَ ، وَتَغْفِرَ لِي ذَنْبِيَ ، وَأَسْأَلُكَ الدَّرَجَاتِ الْعُلَى مِنَ الْجَنَّةِ آمِينَ.

اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ أَنْ تُبَارِكَ فِي نَفْسِي ، وَفِي سَمْعِي ، وَفِي بَصَرِي ، وَفِي رُوحِي ، وَفِي خَلْقِي ، وَفِي خُلُقِي ، وَفِي أَهْلِي ، وَفِي مَحْيَايَ ، وَفِي مَمَاتِي ، وَفِي عَمَلِي ، فَتَقَبَّلْ حَسَنَاتِي ، وَأَسْأَلُكَ الدَّرَجَاتِ الْعُلَى مِنَ الْجَنَّةِ آمِينَ.

اللَّهُمَّ لَكَ الْحَمْدُ كُلُّهُ ، اللَّهُمَّ لَا قَابِضَ لِمَا بَسَطْتَ ، وَلَا بَاسِطَ لِمَا قَبَضْتَ ، وَلَا هَادِيَ لِمَنْ أَضْلَلْتَ وَلَا مُضِلَّ لِمَنْ هَدَيْتَ ، وَلَا مُعْطِيَ لِمَا مَنَعْتَ وَلَا مَانِعَ لِمَا أَعْطَيْتَ ، وَلَا مُقَرِّبَ رَبِّ لِمَا بَاعَدْتَ ، وَلَا مُبَاعِدَ لِمَا قَرَّبْتَ ، اللَّهُمَّ ابْسُطْ عَلَيْنَا مِنْ بَرَكَاتِكَ وَرَحْمَتِكَ وَفَضْلِكَ وَرِزْقِكَ ، اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ النَّعِيمَ الْمُقِيمَ الَّذِي لَا يَحُولُ وَلَا يَزُولُ ، اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ النَّعِيمَ يَوْمَ الْعَيْلَةِ وَالْأَمْنِ يَوْمَ الْخَوْفِ ، اللَّهُمَّ إِنِّي عَائِذٌ بِكَ مِنْ شَرِّ مَا أَعْطَيْتَنَا وَشَرِّ مَا مَنَعْتَنَا.

اللَّهُمَّ حَبِّبْ إِلَيْنَا الْإِيمَانَ وَزَيِّنْهُ فِي قُلُوبِنَا وَكَرِّهْ إِلَيْنَا الْكُفْرَ وَالْفُسُوقَ وَالْعِصْيَانَ ، وَاجْعَلْنَا مِنَ الرَّاشِدِينَ ، اللَّهُمَّ تَوَفَّنَا مُسْلِمِينَ ، وَأَحْيِنَا مُسْلِمِينَ ، وَأَلْحِقْنَا بِالصَّالِحِينَ غَيْرَ خَزَايَا وَلَا مَفْتُونِينَ ، اللَّهُمَّ قَاتِلِ الْكَفَرَةَ الَّذِينَ يُكَذِّبُونَ رُسُلَكَ ، وَيَصُدُّونَ عَنْ سَبِيلِكَ ، وَاجْعَلْ عَلَيْهِمْ رِجْزَكَ وَعَذَابَكَ ، اللَّهُمَّ قَاتِلِ الْكَفَرَةَ الَّذِينَ أُوتُوا الْكِتَابَ ، إِلَهَ الْحَقِّ.. آمِينَ.

ऐ अल्लाह, मैं जो करता हूँ और जो कर्म करता हूँ उसकी भलाई, जो छिपा है और जो प्रकट है उसकी भलाई तथा जन्नत के ऊँचे दर्जे तुझसे माँगता हूँ। आमीन।

ऐ अल्लाह, मैं तुझसे माँगता हूँ कि मेरा उल्लेख ऊँचा कर, मेरा बोझ उतार, मेरा मामला ठीक कर, मेरा दिल पवित्र कर, मेरी लज्जा की रक्षा कर, मेरे दिल को प्रकाशित कर और मेरा पाप क्षमा कर। मैं तुझसे जन्नत के ऊँचे दर्जे माँगता हूँ। आमीन।

ऐ अल्लाह, मैं तुझसे माँगता हूँ कि मेरे व्यक्तित्व, सुनने, देखने, रूह, शारीरिक रचना, आचरण, परिवार, जीवन, मृत्यु और कर्म में बरकत दे और मेरे नेक कर्म स्वीकार कर। मैं तुझसे जन्नत के ऊँचे दर्जे माँगता हूँ। आमीन।

ऐ अल्लाह, सारी प्रशंसा तेरे लिए है। ऐ अल्लाह, जिसे तू फैलाए उसे समेटने वाला कोई नहीं और जिसे तू समेटे उसे फैलाने वाला कोई नहीं; जिसे तू भटकाए उसे मार्ग दिखाने वाला कोई नहीं और जिसे तू मार्ग दिखाए उसे भटकाने वाला कोई नहीं; जिसे तू रोके उसे देने वाला कोई नहीं और जिसे तू दे उसे रोकने वाला कोई नहीं। मेरे रब, जिसे तू दूर करे उसे निकट करने वाला कोई नहीं और जिसे तू निकट करे उसे दूर करने वाला कोई नहीं। ऐ अल्लाह, अपनी बरकत, दया, अनुग्रह और रोज़ी हम पर फैला। ऐ अल्लाह, मैं तुझसे स्थायी नेमत माँगता हूँ जो न बदले और न समाप्त हो। ऐ अल्लाह, मैं अभाव के दिन नेमत और भय के दिन सुरक्षा माँगता हूँ। ऐ अल्लाह, जो तूने हमें दिया और जो हमसे रोका उसकी बुराई से तेरी शरण माँगता हूँ।

ऐ अल्लाह, ईमान को हमारा प्रिय बना और हमारे दिलों में उसे सुशोभित कर; कुफ़्र, पापाचार और अवज्ञा को हमारे लिए अप्रिय बना और हमें सही मार्ग पाने वालों में शामिल कर। ऐ अल्लाह, हमें मुसलमान रहते हुए मृत्यु दे, मुसलमान रहते हुए जीवन दे और अपमानित या परीक्षा में भटके बिना नेक लोगों से मिला दे। ऐ अल्लाह, उन इनकार करने वालों से लड़ जो तेरे रसूलों को झुठलाते और तेरी राह से रोकते हैं, और उन पर अपनी यातना उतार। ऐ अल्लाह, किताब दिए गए लोगों में से इनकार करने वालों से लड़, ऐ सत्य के उपास्य। आमीन।

اللَّهُمَّ بِعِلْمِكَ الْغَيْبَ ، وَقُدْرَتِكَ عَلَى الْخَلْقِ ؛ أَحْيِنِي مَا عَلِمْتَ الْحَيَاةَ خَيْرًا لِي ، وَتَوَفَّنِي إِذَا عَلِمْتَ الْوَفَاةَ خَيْرًا لِي ، اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ خَشْيَتَكَ فِي الْغَيْبِ وَالشَّهَادَةِ ، وَأَسْأَلُكَ كَلِمَةَ الْحَقِّ فِي الرِّضَا وَالْغَضَبِ ، وَأَسْأَلُكَ الْقَصْدَ فِي الْغِنَى وَالْفَقْرِ ، وَأَسْأَلُكَ نَعِيماً لَا يَنْفَدُ ، وَأَسْأَلُكَ قُرَّةَ عَيْنٍ لَا تَنْقَطُعُ ، وَأَسْأَلُكَ الرِّضَا بَعْدَ الْقَضَاءِ ، وَأَسْأَلُكَ بَرْدَ الْعَيْشِ بَعْدَ الْمَوْتِ ، وَأَسْأَلُكَ لَذَّةَ النَّظَرِ إِلَى وَجْهِكَ ، وَالشَّوْقَ إِلَى لِقَائِكَ ، فِي غَيْرِ ضَرَّاءَ مُضِرَّةٍ وَلَا فِتْنَةٍ مُضِلَّةٍ ، اللَّهُمَّ زَيِّنَّا بِزِينَةِ الْإِيمَانِ ، وَاجْعَلْنَا هُدَاةً مُهْتَدِينَ.

اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ فِعْلَ الْخَيْرَاتِ ، وَتَرْكَ الْمُنْكَرَاتِ ، وَحُبَّ الْمَسَاكِينَ ، وَأَنْ تَغْفِرَ لِي وَتَرْحَمَنِي ، وَإِذَا أَرَدْتَ فِتْنَةَ قَومٍ فَتَوَفَّنِي غَيْرَ مَفْتُونٍ ، وَأَسْأَلُكَ حُبَّكَ ، وَحُبَّ مَنْ يُحِبُّكَ ، وَحُبَّ كُلِّ عَمَلٍ يُقَرِّبُنِي إِلَى حُبِّكَ.

اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ مِنَ الْخَيْرِ كُلِّهُ ؛ عَاجِلِهِ وَآجِلِهِ ، مَا عَلِمْتُ مِنْهُ وَمَا لَمْ أَعْلَمْ ، وَأَعُوذُ بِكَ مِنْ الشَّرِّ كُلِّهُ عَاجِلِهِ وَآجِلِهِ ، مَا عَلِمْتُ مِنْهُ وَمَا لَمْ أَعْلَمْ.

اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ مِنْ خَيْرِ مَا سَأَلَكَ عَبْدُكَ وَنَبِيُّكَ مُحَمَّدٌ ، وَأَعُوذُ بِكَ مِنْ شَرِّ مَا اسْتَعَاذَ بِكَ مِنْهُ عَبْدُكَ وَنَبِيُّكَ مُحَمَّدٌ.

اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ الْجَنَّةَ ، وَمَا قَرَّبَ إِلَيْهَا مِنْ قَوْلٍ أَوْ عَمَلٍ ، وَأَعُوذُ بِكَ مِنَ النَّارِ وَمَا قَرَّبَ إِلَيْهَا مِنْ قَوْلٍ أَوْ عَمَلٍ ، وَأَسْأَلُكَ أَنْ تَجْعَلَ كُلَّ قَضَاءٍ قَضَيْتَهُ لِي خَيْرًا.

ऐ अल्लाह, तेरे परोक्ष ज्ञान और सृष्टि पर तेरी शक्ति के द्वारा, मुझे तब तक जीवित रख जब तक तू जीवन को मेरे लिए बेहतर जाने और मुझे मृत्यु दे जब तू मृत्यु को मेरे लिए बेहतर जाने। ऐ अल्लाह, मैं तुझसे छिपे और खुले में तेरा भय, प्रसन्नता और क्रोध में सत्य वचन, धन और ग़रीबी में संतुलन, कभी समाप्त न होने वाली नेमत, कभी न टूटने वाली आँखों की ठंडक, तेरे निर्णय के बाद संतोष, मृत्यु के बाद जीवन की शांति, तेरे चेहरे को देखने का आनंद और तुझसे मिलने की चाह माँगता हूँ, बिना हानि पहुँचाने वाले कष्ट और भटका देने वाली परीक्षा के। ऐ अल्लाह, हमें ईमान की शोभा से सजा और हमें मार्गदर्शन पाने वाला और मार्ग दिखाने वाला बना।

ऐ अल्लाह, मैं तुझसे अच्छे काम करना, बुराइयाँ छोड़ना, निर्धनों से प्रेम, तेरी क्षमा और दया माँगता हूँ। जब तू किसी समुदाय की परीक्षा चाहे तो मुझे भटके बिना मृत्यु दे। मैं तुझसे तेरा प्रेम, तुझे प्रेम करने वालों का प्रेम और हर उस काम का प्रेम माँगता हूँ जो मुझे तेरे प्रेम के निकट करे।

ऐ अल्लाह, मैं तुझसे सारी भलाई माँगता हूँ: तत्काल और बाद की, जिसे मैं जानता हूँ और जिसे नहीं जानता। मैं सारी बुराई से तेरी शरण माँगता हूँ: तत्काल और बाद की, जिसे मैं जानता हूँ और जिसे नहीं जानता।

ऐ अल्लाह, मैं तुझसे वह सर्वोत्तम भलाई माँगता हूँ जो तेरे बंदे और नबी मुहम्मद ने तुझसे माँगी, और उस बुराई से तेरी शरण माँगता हूँ जिससे तेरे बंदे और नबी मुहम्मद ने तेरी शरण माँगी।

ऐ अल्लाह, मैं तुझसे जन्नत और उस तक निकट करने वाली बात या कर्म माँगता हूँ, आग और उस तक निकट करने वाली बात या कर्म से तेरी शरण माँगता हूँ, और तुझसे माँगता हूँ कि तू मेरे लिए किए गए हर फैसले को मेरे लिए भलाई बना दे।

اللَّهُمَّ اقْسِمْ لَنَا مِنْ خَشْيَتِكَ مَا تَحُولُ بِهِ بَيْنَنَا وَبَيْنَ مَعَاصِيكَ ، وَمِنْ طَاعَتِكَ مَا تُبَلِّغُنَا بِهِ جَنَّتَكَ ، وَمِنَ الْيَقِينِ مَا تُهَوِّنُ بِهِ عَلَيْنَا مَصَائِبَ الدُّنْيَا ، اللَّهُمَّ مَتِّعْنَا بِأَسْمَاعِنَا ، وَأَبْصَارِنَا ، وَقُوَّاتِنَا مَا أَحْيَيْتَنَا ، وَاجْعَلْهُ الْوَارِثَ مِنَّا ، وَاجْعَلْ ثَأْرَنَا عَلَى مَنْ ظَلَمَنَا ، وَانْصُرْنَا عَلَى مَنْ عَادَانَا ، وَلَا تَجْعَلْ مُصِيبَتَنَا فِي دِينِنَا وَلَا تَجْعَلْ الدُّنْيَا أَكْبَرَ هَمِّنَا ، وَلَا مَبْلَغَ عِلْمِنَا ، وَلَا تُسَلِّطْ عَلَيْنَا مَنْ لَا يَرْحَمُنَا.

اللَّهُمَّ إِنَّا نَسْأَلُكَ مُوجِبَاتِ رَحْمَتِكَ ، وَعَزَائِمَ مَغْفِرَتِكَ ، وَالسَّلَامَةَ مِنْ كُلِّ إِثْمٍ ، وَالْغَنِيمَةَ مِنْ كُلِّ بِرٍّ ، وَالْفَوْزَ بِالْجَنَّةِ ، وَالنَّجَاةَ مِنَ النَّارِ.

اللَّهُمَّ لَا تَدَعْ لَنَا ذَنْبًا إِلَّا غَفَرْتَهُ ، وَلَا هَمًّا إِلَّا فَرَّجْتَهُ ، وَلَا دَيْنًا إِلَّا قَضَيْتَهُ ، وَلَا مَرِيضاً إِلَّا شَفَيْتَهُ ، وَلَا مُبْتَلَى إِلَّا عَافَيْتَهُ ، وَلَا ضَالاً إِلَّا هَدَيْتَهُ ، وَلَا غَائِباً إِلَّا رَدَدْتَهُ ، وَلَا مَظْلُوماً إِلَّا نَصَرْتَهُ ، وَلَا أَسِيراً إِلَّا فَكَكْتَهُ ، وَلَا مَيِّتاً إِلَّا رَحِمْتَهُ ، وَلَا حَاجَةً لَنَا فِيهَا صَلَاحٌ وَلَكَ فِيهَا رِضاً إِلَّا قَضَيْتَهَا وَيَسَّرْتَهَا بِفَضْلِكَ يَا أَكْرَمَ الْأَكْرَمِينَ.

اللَّهُمَّ رَبِّ أَعِنِّي وَلَا تُعِنْ عَلَيَّ ، وَانْصُرْنِي وَلَا تَنْصُرْ عَلَيَّ ، وَامْكُرْ لِي وَلَا تَمْكُرْ عَلَيَّ ، وَاهْدِنِي وَيَسِّرِ الْهُدَى إِلَيَّ ، وَانْصُرْنِي عَلَى مَنْ بَغَى عَلَيَّ.

اللَّهُمَّ رَبِّ اجْعَلْنِي لَكَ شَكَّاراً ، لَكَ ذَكَّاراً ، لَكَ رَهَّاباً ، لَكَ مِطْوَاعاً ، إِلَيْكَ مُخْبِتاً أَوَّاهاً مُنِيباً ، رَبِّ تَقَبَّلْ تَوْبَتِي ، وَاغْسِلْ حَوْبَتِي ، وَأَجِبْ دَعْوَتِي ، وَثَبِّتْ حُجَّتِي ، وَاهْدِ قَلْبِي ، وَسَدِّدْ لِسَانِي ، وَاسْلُلْ سَخِيمَةَ قَلْبِي.

ऐ अल्लाह, हमें अपने भय का इतना हिस्सा दे जो हमारे और तेरी अवज्ञा के बीच बाधा बने; अपनी आज्ञाकारिता का इतना हिस्सा दे जिससे तू हमें अपनी जन्नत तक पहुँचा दे; और इतना यक़ीन दे जिससे दुनिया की विपत्तियाँ हमारे लिए आसान कर दे। ऐ अल्लाह, जब तक तू हमें जीवित रखे हमारे सुनने, देखने और हमारी शक्ति से हमें लाभ दे और इन्हें हमारे अंत तक बनाए रख। जिन्होंने हम पर अत्याचार किया उनसे हमें न्याय दिला और जिन्होंने हमसे शत्रुता की उनके विरुद्ध हमारी सहायता कर। हमारी विपत्ति हमारे दीन में न बना, दुनिया को हमारी सबसे बड़ी चिंता और हमारे ज्ञान की अंतिम सीमा न बना, और हम पर उन्हें हावी न कर जो हम पर दया नहीं करते।

ऐ अल्लाह, हम तुझसे तेरी दया प्राप्त करने वाले साधन, तेरी क्षमा सुनिश्चित करने वाली नेकियाँ, हर पाप से सुरक्षा, हर भलाई का लाभ, जन्नत की सफलता और आग से मुक्ति माँगते हैं।

ऐ अल्लाह, हमारा कोई पाप ऐसा न छोड़ जिसे तू क्षमा न करे; कोई चिंता ऐसी न छोड़ जिसे दूर न करे; कोई कर्ज़ ऐसा न छोड़ जिसे चुका न दे; कोई बीमार ऐसा न छोड़ जिसे शिफ़ा न दे; कोई विपत्ति में पड़ा ऐसा न छोड़ जिसे कुशलता न दे; कोई भटका हुआ ऐसा न छोड़ जिसे मार्गदर्शन न दे; कोई अनुपस्थित ऐसा न छोड़ जिसे लौटा न दे; कोई पीड़ित ऐसा न छोड़ जिसकी सहायता न करे; कोई बंदी ऐसा न छोड़ जिसे रिहा न करे; कोई मृतक ऐसा न छोड़ जिस पर दया न करे। हमारी हर ऐसी आवश्यकता जिसमें हमारी भलाई और तेरी प्रसन्नता हो, अपने अनुग्रह से पूरी और आसान कर, ऐ सबसे अधिक उदार।

ऐ अल्लाह, मेरे रब, मेरी सहायता कर और मेरे विरुद्ध सहायता न कर; मुझे विजय दे और मेरे विरुद्ध विजय न दे; मेरे लिए युक्ति कर और मेरे विरुद्ध युक्ति न कर; मुझे मार्ग दिखा और मेरे लिए मार्गदर्शन आसान कर; जिसने मुझ पर अत्याचार किया उसके विरुद्ध मेरी सहायता कर।

ऐ अल्लाह, मेरे रब, मुझे तेरा बहुत शुक्र करने वाला, तेरा बहुत ज़िक्र करने वाला, तुझसे बहुत डरने वाला, तेरा बहुत आज्ञाकारी, तेरी ओर विनम्र, आह भरने वाला और लौटने वाला बना। मेरे रब, मेरी तौबा स्वीकार कर, मेरे पाप धो दे, मेरी दुआ स्वीकार कर, मेरी दलील स्थिर कर, मेरे दिल को मार्ग दिखा, मेरी ज़बान को सही रख और मेरे दिल की दुर्भावना निकाल दे।

اللَّهُمَّ إِنَّا نَسْأَلُكَ يُسْراً لَيْسَ بَعْدَهُ عُسْرٌ ، وَغِنًى لَيْسَ بَعْدَهُ فَقْرٌ ، وَأَمْناً لَيْسَ بَعْدَهُ خَوْفٌ ، وَسَعَادَةً لَيْسَ بَعْدَهَا شَقَاءٌ.

اللَّهُمَّ أَلِّفْ بَيْنَ قُلُوبِنَا ، وَأَصْلِحْ ذَاتَ بَيْنِنَا ، وَاهْدِنَا سُبُلَ السَّلَامِ ، وَنَجِّنَا مِنَ الظُّلُمَاتِ إِلَى النُّورِ ، وَجَنِّبْنَا الْفَوَاحِشَ مَا ظَهَرَ مِنْهَا وَمَا بَطَنَ ، وَبَارِكْ لَنَا فِي أَسْمَاعِنَا ، وَأَبْصَارِنَا ، وَقُلُوبِنَا ، وَأَزْوَاجِنَا ، وَذُرِّيَّاتِنَا ، وَتُبْ عَلَيْنَا إِنَّكَ أَنْتَ التَّوَّابُ الرَّحِيمُ ، وَاجْعَلْنَا شَاكِرِينَ لِنِعَمِكَ مُثْنِينَ بِهَا عَلَيْكَ قَابِلِينَ لَهَا وَأَتْمِمْهَا عَلَيْنَا.

اللَّهُمَّ يَا مُقَلِّبَ الْقُلُوبِ وَالْأَبْصَارِ ، ثَبِّتْ قُلُوبَنَا عَلَى طَاعَتِكَ ، وَلَا تُزِغْ قُلُوبَنَا بَعْدَ إِذْ هَدَيْتَنَا ، وَلَا تَفْتِنَّا فِي دِينِنَا ، وَاجْعَلْ يَوْمَنَا خَيْراً مِنْ أَمْسِنَا ، وَاجْعَلْ غَدَنَا خَيْراً مِنْ يَوْمِنَا ، وَاجْعَلْ خَيْرَ أَعْمَارِنَا أَوَاخِرَهَا ، وَخَيْرَ أَعْمَالِنَا خَوَاتِيمَهَا ، وَخَيْرَ أَيَّامِنَا يَوْمَ نَلْقَاكَ وَأَنْتَ رَاضٍ عَنَّا.

اللَّهُمَّ أَنْتَ الَّذِي خَلَقْتَنِي فَأَنْتَ تَهْدِينِ ، وَأَنْتَ الَّذِي تُطْعِمُنِي وَتَسْقِينِ ، وَإِذَا مَرِضْتُ فَأَنْتَ تَشْفِينِ ، وَأَنْتَ الَّذِي تُمِيتُنِي ثُمَّ تُحْيِينِ ، وَأَنْتَ الَّذِي أَطْمَعُ أَنْ يَغْفِرَ لِي خَطِيئَتِي يَوْمَ الدِّينِ ، رَبِّ هَبْ لِي حُكْماً وَأَلْحِقْنِي بِالصَّالِحِينَ ، وَاجْعَلْ لِي لِسَانَ صِدْقٍ فِي الْآخِرِينَ ، وَاجْعَلْنِي مِنْ وَرَثَةِ جَنَّةِ النَّعِيمِ ، وَاغْفِرْ لِآبَائِنَا وَأُمَّهَاتِنَا مِنَ الْمُسْلِمِينَ وَلَا تُخْزِنِي يَوْمَ يُبْعَثُونَ ، يَوْمَ لَا يَنْفَعُ مَالٌ وَلَا بَنُونَ ، إِلَّا مَنْ أَتَى اللَّهَ بِقَلْبٍ سَلِيمٍ.

اللَّهُمَّ احْفَظْنِي بِالْإِسْلَامِ قَائِماً ، وَاحْفَظْنِي بِالْإِسْلَامِ قَاعِداً ، وَاحْفَظْنِي بِالْإِسْلَامِ رَاقِداً ، وَلَا تُشْمِتْ بِي عَدُوّاً وَلَا حَاسِداً.

ऐ अल्लाह, हम तुझसे ऐसी आसानी माँगते हैं जिसके बाद कठिनाई न हो, ऐसी समृद्धि जिसके बाद ग़रीबी न हो, ऐसी सुरक्षा जिसके बाद भय न हो और ऐसा सौभाग्य जिसके बाद दुर्भाग्य न हो।

ऐ अल्लाह, हमारे दिलों में मेल पैदा कर, हमारे पारस्परिक संबंध ठीक कर, हमें शांति के रास्ते दिखा और अँधेरों से नूर की ओर निकाल। प्रकट और छिपी अश्लीलताओं से हमें दूर रख। हमारे सुनने, देखने, दिलों, जीवनसाथियों और संतानों में बरकत दे और हमारी तौबा स्वीकार कर; निश्चय ही तू बहुत तौबा स्वीकार करने वाला, दयालु है। हमें अपनी नेमतों का शुक्र करने वाला, उनकी प्रशंसा से तेरा गुणगान करने वाला और उन्हें स्वीकार करने वाला बना, और अपनी नेमतें हम पर पूरी कर।

ऐ अल्लाह, दिलों और निगाहों को फेरने वाले, हमारे दिलों को अपनी आज्ञाकारिता पर स्थिर रख; मार्गदर्शन देने के बाद हमारे दिलों को टेढ़ा न कर और हमारे दीन में हमारी परीक्षा न ले। हमारा आज बीते कल से बेहतर और हमारा आने वाला कल आज से बेहतर बना। हमारे जीवन का सबसे अच्छा भाग उसका अंत, हमारे कर्मों का सबसे अच्छा भाग उनका अंत और हमारे दिनों का सबसे अच्छा दिन वह बना जब हम तुझसे मिलें और तू हमसे प्रसन्न हो।

ऐ अल्लाह, तूने मुझे पैदा किया, तू ही मुझे मार्ग दिखाता है, तू ही मुझे खिलाता और पिलाता है। जब मैं बीमार होता हूँ तो तू ही शिफ़ा देता है, तू ही मुझे मृत्यु देगा और फिर जीवित करेगा। मुझे आशा है कि प्रतिफल के दिन तू मेरा पाप क्षमा करेगा। मेरे रब, मुझे विवेक दे और नेक लोगों से मिला दे, बाद में आने वालों में मेरे लिए सच्ची प्रशंसा रख और मुझे नेमतों वाली जन्नत के वारिसों में शामिल कर। हमारे मुसलमान माता-पिता को क्षमा कर और पुनर्जीवन के दिन मुझे अपमानित न कर, उस दिन जब धन और संतान लाभ न देंगे, सिवाय उसके जो अल्लाह के पास निर्मल दिल लेकर आए।

ऐ अल्लाह, खड़े, बैठे और लेटे हुए इस्लाम के साथ मेरी रक्षा कर और किसी शत्रु या ईर्ष्यालु को मेरी दशा पर खुश न होने दे।

اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ مِنْ كُلِّ خَيْرٍ خَزَائِنُهُ بِيَدِكَ ، وَأَعُوذُ بِكَ مِنْ كُلِّ شَرٍّ خَزَائِنُهُ بِيَدِكَ.

اللَّهُمَّ يَا ذَا الْحَبْلِ الشَّدِيدِ ، وَالْأَمْرِ الرَّشِيدِ ، أَسْأَلُكَ الْأَمْنَ يَوْمَ الْوَعِيدِ ، وَالْجَنَّةَ دَارَ الْخُلُودِ ، مَعَ الْمُقَرَّبِينَ الشُّهُودِ ، الرُّكَّعِ السُّجُودِ ، الْمُوفِينَ بِالْعُهُودِ ، إِنَّكَ رَحِيمٌ وَدُودٌ ، وَإِنَّكَ تَفْعَلُ مَا تُرِيدُ.

اللَّهُمَّ اجْعَلْنَا هَادِينَ مُهْتَدِينَ ، غَيْرَ ضَالِّينَ وَلَا مُضِلِّينَ ، سِلْماً لِأَوْلِيَائِكَ ، وَحَرْباً عَلَى أَعْدَائِكَ ، نُحِبُّ بِحُبِّكَ مَنْ أَحَبَّكَ ، وَنُعَادِي بِعَدَاوَتِكَ مَنْ خَالَفَكَ.اللَّهُمَّ هَذَا الدُّعَاءُ وَمِنْكَ الْإِجَابَةُ ، اللَّهُمَّ هَذَا الْجُهْدُ وَعَلَيْكَ التُّكْلَانُ.

اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ إِيمَاناً لَا يَرْتَدُّ ، وَنَعِيماً لَا يَنْفَدُ ، وَمُرَافَقَةَ نَبِيِّكَ مُحَمَّدٍ فِي أَعْلَى جَنَّةِ الْخُلْدِ.

اللَّهُمَّ آتِنِي الْحِكْمَةَ الَّتِي مَنْ أُوتِيَهَا فَقَدْ أُوتِيَ خَيْراً كَثِيراً.

ऐ अल्लाह, मैं तुझसे हर उस भलाई को माँगता हूँ जिसके ख़ज़ाने तेरे हाथ में हैं और हर उस बुराई से तेरी शरण माँगता हूँ जिसके ख़ज़ाने तेरे हाथ में हैं।

ऐ अल्लाह, ऐ मज़बूत रस्सी और सही आदेश वाले, मैं तुझसे चेतावनी के दिन सुरक्षा और हमेशा रहने वाली जन्नत माँगता हूँ, तेरे निकट रहने वालों के साथ जो हाज़िर रहते, रुकू और सज्दा करते तथा वादे पूरे करते हैं। निश्चय ही तू दयालु और प्रेम करने वाला है और जो चाहता है करता है।

ऐ अल्लाह, हमें मार्ग दिखाने वाला और मार्गदर्शन पाने वाला बना, न भटके हुए और न भटकाने वाले; अपने मित्रों के लिए शांतिपूर्ण और अपने शत्रुओं के विरुद्ध युद्ध करने वाला बना। तेरे प्रेम से प्रेम करने वाले से हम प्रेम करें और तेरे विरोध के कारण विरोध करने वाले से विरोध रखें। ऐ अल्लाह, यह दुआ है और उत्तर तेरी ओर से है; ऐ अल्लाह, यह प्रयास है और भरोसा तुझ पर है।

ऐ अल्लाह, मैं तुझसे ऐसा ईमान माँगता हूँ जो फिर न पलटे, ऐसी नेमत जो समाप्त न हो और अनंत जन्नत के सर्वोच्च स्थान में तेरे नबी मुहम्मद की संगति माँगता हूँ।

ऐ अल्लाह, मुझे वह बुद्धिमत्ता प्रदान कर जिसे दिया गया उसे बहुत भलाई दी गई।

اللَّهُمَّ أَعِنِّي عَلَى ذِكْرِكَ وَشُكْرِكَ وَحُسْنِ عِبَادَتِكَ.

اللَّهُمَّ ارْحَمْنِي ، فَأَنْتَ خَيْرُ الرَّاحِمِينَ ، وَارْزُقْنِي ، فَأَنْتَ خَيْرُ الرَّازِقِينَ ، وَاغْفِرْ لِي فَأَنْتَ خَيْرُ الْغَافِرِينَ ، وَانْصُرْنِي ، فَأَنْتَ خَيْرُ النَّاصِرِينَ.

اللَّهُمَّ رَحْمَتَكَ أَرْجُو فَلَا تَكِلْنِي إِلَى نَفْسِي طَرْفَةَ عَيْنٍ ، وَأَصْلِحْ لِي شَأْنِي كُلَّهُ ، لَا إِلَهَ إِلَّا أَنْتَ.

اللَّهُمَّ زِدْنَا وَلَا تَنْقُصْنَا ، وَأَكْرِمْنَا وَلَا تُهِنَّا ، وَأَعْطِنَا وَلَا تَحْرِمْنَا ، وَآثِرْنَا وَلَا تُؤْثِرْ عَلَيْنَا ، وَأَرْضِنَا وَارْضَ عَنَّا.

اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ عِيشَةً نَقِيَّةً ، وَمِيتَةً سَوِيَّةً ، وَمَرَدّاً غَيْرَ مُخْزٍ وَلَا فَاضِحٍ.

ऐ अल्लाह, तेरा ज़िक्र करने, तेरा शुक्र अदा करने और अच्छी तरह तेरी इबादत करने में मेरी सहायता कर।

ऐ अल्लाह, मुझ पर दया कर, तू सबसे अच्छा दया करने वाला है; मुझे रोज़ी दे, तू सबसे अच्छा रोज़ी देने वाला है; मुझे क्षमा कर, तू सबसे अच्छा क्षमा करने वाला है; मेरी सहायता कर, तू सबसे अच्छा सहायक है।

ऐ अल्लाह, मैं तेरी रहमत की आशा करता हूँ, इसलिए मुझे पलक झपकने भर के लिए भी मेरे हाल पर न छोड़ और मेरे सभी काम ठीक कर दे। तेरे सिवा कोई इबादत के योग्य नहीं।

ऐ अल्लाह, हमें बढ़ा, कम न कर; हमें सम्मान दे, अपमानित न कर; हमें दे, वंचित न कर; हमें प्राथमिकता दे, हम पर दूसरों को प्राथमिकता न दे; हमें संतुष्ट कर और हमसे प्रसन्न हो।

ऐ अल्लाह, मैं तुझसे पवित्र जीवन, अच्छी मृत्यु और ऐसी वापसी माँगता हूँ जिसमें न अपमान हो न रुसवाई।

اللَّهُمَّ رَبِّ أَوْزِعْنِي أَنْ أَشْكُرَ نِعْمَتَكَ الَّتِي أَنْعَمْتَ عَلَيَّ وَعَلَى وَالِدَيَّ ، وَأَنْ أَعْمَلَ صَالِحًا تَرْضَاهُ وَأَدْخِلْنِي بِرَحْمَتِكَ فِي عِبَادِكَ الصَّالِحِينَ.

اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ الْعَفْوَ وَالْعَافِيَةَ وَالْمُعَافَاةَ فِي الدُّنْيَا وَالْآخِرَةِ.

اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ الْهُدَى ، وَالتُّقَى ، وَالْعَفَافَ وَالْغِنَى.

اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ عِلْماً نَافِعًا ، وَرِزْقاً طَيِّباً ، وَعَمَلاً مُتَقَبَّلاً.

اللَّهُمَّ اغْفِرْ لِي ، وَاهْدِنِي وَارْزُقْنِي ، وَعَافِنِي ، أَعُوذُ بِاللَّهِ مِنْ ضِيقِ الْمَقَامِ يَوْمَ الْقِيَامَةِ.

ऐ अल्लाह, मेरे रब, मुझे प्रेरणा दे कि मैं तेरी उस नेमत का शुक्र अदा करूँ जो तूने मुझ पर और मेरे माता-पिता पर की है और ऐसे नेक काम करूँ जिनसे तू प्रसन्न हो। अपनी दया से मुझे अपने नेक बंदों में शामिल कर।

ऐ अल्लाह, मैं तुझसे दुनिया और आख़िरत में क्षमा, कुशलता और सुरक्षा माँगता हूँ।

ऐ अल्लाह, मैं तुझसे मार्गदर्शन, तक़वा, पवित्रता और आत्मनिर्भरता माँगता हूँ।

ऐ अल्लाह, मैं तुझसे लाभदायक ज्ञान, पवित्र रोज़ी और स्वीकार किया गया कर्म माँगता हूँ।

ऐ अल्लाह, मुझे क्षमा कर, मार्गदर्शन दे, रोज़ी दे और कुशलता दे। मैं क़ियामत के दिन कठिन स्थिति से अल्लाह की शरण माँगता हूँ।

اللَّهُمَّ قِنِي شَرَّ نَفْسِي ، وَاعْزِمْ لِي عَلَى أَرْشَدِ أَمْرِي ، اللَّهُمَّ اغْفِرْ لِي مَا أَسْرَرْتُ ، وَمَا أَعْلَنْتُ وَمَا أَخْطَأْتُ ، وَمَا عَمَدْتُ ، وَمَا عَلِمْتُ ، وَمَا جَهِلْتُ.

اللَّهُمَّ أَكْثِرْ مَالِي ، وَوَلَدِي ، وَبَارِكْ لِي فِيمَا أَعْطَيْتَنِي ، وَأَطِلْ حَيَاتِي عَلَى طَاعَتِكَ ، وَأَحْسِنْ عَمَلِي وَاغْفِرْ لِي.

اللَّهُمَّ اسْتُرْ عَوَرَاتِي ، وَآمِنْ رَوْعَاتِي ، وَاحْفَظْنِي مِنْ بَيْنِ يَدَيَّ وَمِنْ خَلْفِي ، وَعَنْ يَمِينِي وَعَنْ شِمَالِي ، وَمِنْ فَوْقِي ، وَأَعُوذُ بِكَ أَنْ أُغْتَالَ مِنْ تَحْتِي.

اللَّهُمَّ أَكْرِمْنِي وَلَا تُهِنِّي ، وَأَعْطِنِي وَلَا تَحْرِمْنِي ، وَزِدْنِي وَلَا تَنْقُصْنِي ، وَآثِرْنِي وَلَا تُؤْثِرْ عَلَيَّ ، وَارْضَ عَنِّي وَأَرْضِنِي.

اللَّهُمَّ افْتَحْ لَنَا فَتْحاً مُبِيناً ، وَاهْدِنَا صِرَاطاً مُسْتَقِيماً ، وَانْصُرْنَا نَصْراً عَزِيزاً، وَأَتِمَّ عَلَيْنَا نِعْمَتَكَ ، وَأَنْزِلْ فِي قُلُوبِنَا سَكِينَتَكَ ، وَانْشُرْ عَلَيْنَا فَضْلَكَ وَرَحْمَتَكَ.

ऐ अल्लाह, मुझे मेरे मन की बुराई से बचा और मेरे लिए मेरे काम के सबसे सही मार्ग का संकल्प दे। ऐ अल्लाह, मेरे छिपे और खुले, भूल से और जानबूझकर किए हुए, जाने हुए और अनजाने पाप क्षमा कर।

ऐ अल्लाह, मेरा धन और संतान बढ़ा, जो तूने मुझे दिया है उसमें बरकत दे, अपनी आज्ञाकारिता में मेरा जीवन लंबा कर, मेरा कर्म अच्छा कर और मुझे क्षमा कर।

ऐ अल्लाह, मेरे ऐब ढँक और मुझे मेरे भय से सुरक्षा दे। मेरे आगे, पीछे, दाएँ, बाएँ और ऊपर से मेरी रक्षा कर और मैं नीचे से अचानक आ घिरने वाली विपत्ति से तेरी शरण माँगता हूँ।

ऐ अल्लाह, मुझे सम्मान दे, अपमानित न कर; मुझे दे, वंचित न कर; मुझे बढ़ा, कम न कर; मुझे प्राथमिकता दे, मुझ पर दूसरों को प्राथमिकता न दे; मुझसे प्रसन्न हो और मुझे संतुष्ट कर।

ऐ अल्लाह, हमें स्पष्ट विजय दे, सीधे मार्ग पर चला, मज़बूत सहायता दे, हम पर अपनी नेमत पूरी कर, हमारे दिलों में अपनी शांति उतार और हम पर अपना अनुग्रह और दया फैला।

اللَّهُمَّ أَعِنَّا عَلَى شَهَوَاتِ أَنْفُسِنَا، وَقَسْوَةِ قُلُوبِنَا ، وَضَعْفِ إِرَادَتِنَا ، وَلَا تَكِلْنَا إِلَى أَنْفُسِنَا وَلَا إِلَى أَحَدٍ غَيْرِكَ.

اللَّهُمَّ لَا تَكِلْنَا إِلَى أَنْفُسِنَا طَرْفَةَ عَيْنٍ وَلَا أَقَلَّ مِنْ ذَلِكَ.

اللَّهُمَّ رَبَّنَا آتِنَا فِي الدُّنْيَا حَسَنَةً وَفِي الْآخِرَةِ حَسَنَةً وَقِنَا عَذَابَ النَّارِ.

اللَّهُمَّ اشْغَلْ قُلُوبَنَا بِحُبِّكَ ، وَأَلْسِنَتَنَا بِذِكْرِكَ ، وَأَبْدَانِنَا بِطَاعَتِكَ ، وَعُقُولَنَا بِالتَّفَكُّرِ فِي خَلْقِكَ وَالتَّفَقُّهِ فِي دِينِكَ.

اللَّهُمَّ اشْفِ مَرْضَانَا ، وَارْحَمْ مَوْتَانَا ، وَعَافِ مُبْتَلَانَا ، وَفُكَّ أَسْرَنَا ، وَاجْبُرْ كَسْرَنَا.

ऐ अल्लाह, हमारे मन की इच्छाओं, हमारे दिलों की कठोरता और हमारे इरादे की कमज़ोरी पर हमारी सहायता कर; हमें हमारे हाल पर या अपने सिवा किसी और के हवाले न कर।

ऐ अल्लाह, हमें पलक झपकने भर या उससे कम समय के लिए भी हमारे हाल पर न छोड़।

ऐ अल्लाह, हमारे रब, हमें दुनिया में भलाई दे और आख़िरत में भलाई दे तथा आग की यातना से बचा।

ऐ अल्लाह, हमारे दिलों को अपने प्रेम में, हमारी ज़बानों को अपने ज़िक्र में, हमारे शरीरों को अपनी आज्ञाकारिता में और हमारी बुद्धि को अपनी सृष्टि पर विचार तथा अपने दीन की समझ में व्यस्त रख।

ऐ अल्लाह, हमारे बीमारों को शिफ़ा दे, हमारे मृतकों पर दया कर, विपत्ति में पड़े लोगों को कुशलता दे, हमारे बंदियों को रिहा कर और हमारी टूटन दूर कर।

اللَّهُمَّ أَطْعِمْنَا مِنْ جُوعٍ ، وَآمِنَّا مِنْ خَوْفٍ، وَقَوِّنَا مِنْ ضَعْفٍ ، وَعَلِّمْنَا مِنْ جَهَالَةٍ، وَأَنْقِذْنَا مِنْ ضَلَالَةٍ.

اللَّهُمَّ اخْتِمْ بِالصَّالِحَاتِ أَعْمَالَنَا ، وَبِالسَّعَادَةِ آجَالَنَا ، وَبَلِّغْنَا مِمَّا يُرْضِيكَ آمَالَنَا.

اللَّهُمَّ أَصْلِحْ لِي دِينِي الَّذِي هُوَ عِصْمَةُ أَمْرِي ، وَأَصْلِحْ لِي دُنْيَايَ الَّتِي فِيهَا مَعَاشِي, وَأَصْلِحْ لِي آخِرَتِي الَّتِي فِيهَا مَعَادِي ، وَاجْعَلِ الْحَيَاةَ زِيَادَةً لِي فِي كُلِّ خَيْرٍ ، وَاجْعَلِ الْمَوْتَ رَاحَةً لِي مِنْ كُلِّ شَرٍّ.

اللَّهُمَّ اجْعَلْ خَيْرَ عُمْرِي أَوَاخِرَهُ ، وَخَيْرَ عَمَلِي خَوَاتِمَهُ ، وَخَيْرَ أَيَّامِي يَوْمَ لِقَاكَ.

اللَّهُمَّ احْفَظْنِي بِالْإِسْلَامِ قَائِماً ، وَاحْفَظْنِي بِالْإِسْلَامِ قَاعِداً ، وَاحْفَظْنِي بِالْإِسْلَامِ رَاقِداً ، وَلَا تُشْمِتْ بِيَ عَدُوًّا وَلَا حَاسِدًا.

ऐ अल्लाह, हमें भूख से भोजन दे, भय से सुरक्षा दे, कमज़ोरी से शक्ति दे, अज्ञानता से ज्ञान दे और भटकाव से बचा।

ऐ अल्लाह, हमारे कर्मों का अंत अच्छे कर्मों से और हमारे जीवन का अंत सौभाग्य से कर; हमें वे आशाएँ पूरी करने दे जिनसे तू प्रसन्न होता है।

ऐ अल्लाह, मेरे लिए मेरा दीन ठीक कर जो मेरे कामों की रक्षा है, मेरी दुनिया ठीक कर जिसमें मेरी आजीविका है, और मेरी आख़िरत ठीक कर जिसमें मेरी वापसी है। जीवन को मेरे लिए हर भलाई में वृद्धि और मृत्यु को हर बुराई से राहत बना।

ऐ अल्लाह, मेरे जीवन का सबसे अच्छा भाग उसका अंतिम भाग, मेरे कर्मों का सबसे अच्छा भाग उनका अंत और मेरे दिनों का सबसे अच्छा दिन तुझसे मिलने का दिन बना।

ऐ अल्लाह, खड़े, बैठे और लेटे हुए इस्लाम के साथ मेरी रक्षा कर और किसी शत्रु या ईर्ष्यालु को मेरी दशा पर खुश न होने दे।

اللَّهُمَّ أَحْيِنَا مُسْلِمِينَ ، وَتَوَفَّنَا مُسْلِمِينَ ، وَأَلْحِقْنَا بِالصَّالِحِينَ.

اللَّهُمَّ أَبْرِمْ لِهَذِهِ الْأُمَّةِ أَمْرَ رُشْدٍ ، يُعَزُّ فِيهِ أَهْلُ طَاعَتِكَ ، وَيُذَلُّ فِيهِ أَهْلُ مَعْصِيَتِكَ ، وَيُؤْمَرُ فِيهِ بِالْمَعْرُوفِ ، وَيُنْهَى فِيهِ عَنِ الْمُنْكَرِ.

اللَّهُمَّ صَلِّ وَسَلِّمْ وَبَارِكْ عَلَى عَبْدِكَ وَرَسُولِكَ مُحَمَّدٍ وَعَلَى آلِهِ وَصَحْبِهِ أَجْمَعِينَ.

ऐ अल्लाह, हमें मुसलमान रहते हुए जीवन दे, मुसलमान रहते हुए मृत्यु दे और हमें नेक लोगों से मिला दे।

ऐ अल्लाह, इस समुदाय के लिए सही मार्ग का ऐसा प्रबंध कर जिसमें तेरी आज्ञा मानने वालों को सम्मान मिले, तेरी अवज्ञा करने वाले दबें, भलाई का आदेश दिया जाए और बुराई से रोका जाए।

ऐ अल्लाह, अपने बंदे और रसूल मुहम्मद पर और उनके सारे परिवार और साथियों पर दया, सलामती और बरकत भेज।

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हदीस पुस्तकालय से

हदीस
Ibn 'Umar (May Allah be pleased with them) reported: The Prophet (ﷺ) said, "May Allah have mercy on a man who performs four Rak'ah before the 'Asr prayer."[Abu Dawud and At- Tirmidhi].
Abu Sa'id al Khudri (Allah be pleased with him) reported Allah's Messenger (ﷺ) as saying: Every servant of Allah who observes fast for a day in the way of Allah, Allah would remove, because of this day, his face farther from the Fire (of Hell) to the extent of seventy years' distance.