पवित्र क़ुरआन पूरा करने की दुआ

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اللَّهُمَّ ارْحَمْنِي بِالْقُرْآنِ وَاجْعَلْهُ لِي إِمَاماً وَنُوراً وَهُدًى وَرَحْمَةً *

اللَّهُمَّ ذَكِّرْنِي مِنْهُ مَا نَسِيتُ وَعَلِّمْنِي مِنْهُ مَا جَهِلْتُ وَارْزُقْنِي تِلَاوَتَهُ آنَاءَ اللَّيْلِ وَأَطْرَافَ النَّهَارِ وَاجْعَلْهُ لِي حُجَّةً يَا رَبَّ الْعَالَمِينَ *

اللَّهُمَّ أَصْلِحْ لِي دِينِي الَّذِي هُوَ عِصْمَةُ أَمْرِي، وَأَصْلِحْ لِي دُنْيَايَ الَّتِي فِيهَا مَعَاشِي، وَأَصْلِحْ لِي آخِرَتِي الَّتِي فِيهَا مَعَادِي، وَاجْعَلِ الْحَيَاةَ زِيَادَةً لِي فِي كُلِّ خَيْرٍ وَاجْعَلِ الْمَوْتَ رَاحَةً لِي مِنْ كُلِّ شَرٍّ *

اللَّهُمَّ اجْعَلْ خَيْرَ عُمْرِي آخِرَهُ وَخَيْرَ عَمَلِي خَوَاتِمَهُ وَخَيْرَ أَيَّامِي يَوْمَ أَلْقَاكَ فِيهِ *

اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ عِيشَةً هَنِيَّةً وَمِيتَةً سَوِيَّةً وَمَرَدًّا غَيْرَ مُخْزٍ وَلَا فَاضِحٍ *

اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ خَيْرَ الْمَسْأَلَةِ وَخَيْرَ الدُّعَاءِ وَخَيْرَ النَّجَاحِ وَخَيْرَ الْعِلْمِ وَخَيْرَ الْعَمَلِ وَخَيْرَ الثَّوَابِ وَخَيْرَ الْحَيَاةِ وَخَيْرَ الْمَمَاتِ وَثَبِّتْنِي وَثَقِّلْ مَوَازِينِي وَحَقِّقْ إِيمَانِي وَارْفَعْ دَرَجَتِي وَتَقَبَّلْ صَلَاتِي وَاغْفِرْ خَطِيئَاتِي وَأَسْأَلُكَ الْعُلَا مِنَ الْجَنَّةِ *

اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ مُوجِبَاتِ رَحْمَتِكَ وَعَزَائِمِ مَغْفِرَتِكَ وَالسَّلَامَةَ مِنْ كُلِّ إِثْمٍ وَالْغَنِيمَةَ مِنْ كُلِّ بِرٍّ وَالْفَوْزَ بِالْجَنَّةِ وَالنَّجَاةَ مِنَ النَّارِ *

اللَّهُمَّ أَحْسِنْ عَاقِبَتَنَا فِي الْأُمُورِ كُلِّهَا، وَأَجِرْنَا مِنْ خِزْيِ الدُّنْيَا وَعَذَابِ الْآخِرَةِ *

اللَّهُمَّ اقْسِمْ لَنَا مِنْ خَشْيَتِكَ مَا تَحُولُ بِهِ بَيْنَنَا وَبَيْنَ مَعْصِيَتِكَ وَمِنْ طَاعَتِكَ مَا تُبَلِّغُنَا بِهَا جَنَّتَكَ وَمِنَ الْيَقِينِ مَا تُهَوِّنُ بِهِ عَلَيْنَا مَصَائِبَ الدُّنْيَا وَمَتِّعْنَا بِأَسْمَاعِنَا وَأَبْصَارِنَا وَقُوَّتِنَا مَا أَحْيَيْتَنَا وَاجْعَلْهُ الْوَارِثَ مِنَّا وَاجْعَلْ ثَأْرَنَا عَلَى مَنْ ظَلَمَنَا وَانْصُرْنَا عَلَى مَنْ عَادَانَا وَلَا تَجْعَلْ مُصِيبَتَنَا فِي دِينِنَا وَلَا تَجْعَلِ الدُّنْيَا أَكْبَرَ هَمِّنَا وَلَا مَبْلَغَ عِلْمِنَا وَلَا تُسَلِّطْ عَلَيْنَا مَنْ لَا يَرْحَمُنَا *

اللَّهُمَّ لَا تَدَعْ لَنَا ذَنْبًا إِلَّا غَفَرْتَهُ وَلَا هَمًّا إِلَّا فَرَّجْتَهُ وَلَا دَيْنًا إِلَّا قَضَيْتَهُ وَلَا حَاجَةً مِنْ حَوَائِجِ الدُّنْيَا وَالْآخِرَةِ إِلَّا قَضَيْتَهَا يَا أَرْحَمَ الرَّاحِمِينَ *

رَبَّنَا آتِنَا فِي الدُّنْيَا حَسَنَةً وَفِي الْآخِرَةِ حَسَنَةً وَقِنَا عَذَابَ النَّارِ وَصَلَّى اللَّهُ عَلَى سَيِّدِنَا وَنَبِيِّنَا مُحَمَّدٍ وَعَلَى آلِهِ وَأَصْحَابِهِ الْأَخْيَارِ وَسَلَّمَ تَسْلِيمًا كَثِيراً.

ऐ अल्लाह, कुरआन के द्वारा मुझ पर दया कर और इसे मेरे लिए मार्गदर्शक, नूर, हिदायत और रहमत बना। *

ऐ अल्लाह, इसमें से जो मैं भूल गया वह याद दिला, जो मैं नहीं जानता वह सिखा और रात के समय तथा दिन के किनारों पर इसकी तिलावत की तौफ़ीक़ दे। ऐ सारे संसारों के रब, इसे मेरे पक्ष में प्रमाण बना। *

ऐ अल्लाह, मेरे लिए मेरा दीन ठीक कर जो मेरे कामों की रक्षा है, मेरी दुनिया ठीक कर जिसमें मेरी आजीविका है और मेरी आख़िरत ठीक कर जिसमें मेरी वापसी है। जीवन को मेरे लिए हर भलाई में वृद्धि और मृत्यु को हर बुराई से राहत बना। *

ऐ अल्लाह, मेरे जीवन का सबसे अच्छा भाग उसका अंत, मेरे कर्मों का सबसे अच्छा भाग उनका अंत और मेरे दिनों का सबसे अच्छा दिन तुझसे मिलने का दिन बना। *

ऐ अल्लाह, मैं तुझसे सुखद जीवन, अच्छी मृत्यु और ऐसी वापसी माँगता हूँ जिसमें न अपमान हो न रुसवाई। *

ऐ अल्लाह, मैं तुझसे उत्तम याचना, दुआ, सफलता, ज्ञान, कर्म, प्रतिफल, जीवन और मृत्यु माँगता हूँ। मुझे स्थिर रख, मेरे कर्मों के पलड़े भारी कर, मेरे ईमान को सच्चा कर, मेरा दर्जा ऊँचा कर, मेरी नमाज़ स्वीकार कर और मेरी गलतियाँ क्षमा कर। मैं तुझसे जन्नत के ऊँचे दर्जे माँगता हूँ। *

ऐ अल्लाह, मैं तुझसे तेरी दया प्राप्त करने वाले साधन, तेरी क्षमा सुनिश्चित करने वाली नेकियाँ, हर पाप से सुरक्षा, हर भलाई का लाभ, जन्नत की सफलता और आग से मुक्ति माँगता हूँ। *

ऐ अल्लाह, हमारे सभी मामलों का परिणाम अच्छा कर और हमें दुनिया के अपमान और आख़िरत की यातना से बचा। *

ऐ अल्लाह, हमें अपने भय का इतना हिस्सा दे जो हमारे और तेरी अवज्ञा के बीच बाधा बने; अपनी आज्ञाकारिता का इतना हिस्सा दे जिससे तू हमें अपनी जन्नत तक पहुँचा दे; और इतना यक़ीन दे जिससे दुनिया की विपत्तियाँ आसान हों। जब तक तू हमें जीवित रखे हमारे सुनने, देखने और हमारी शक्ति से हमें लाभ दे और इन्हें हमारे अंत तक बनाए रख। जिन्होंने हम पर अत्याचार किया उनसे हमें न्याय दिला और जिन्होंने हमसे शत्रुता की उनके विरुद्ध हमारी सहायता कर। हमारी विपत्ति हमारे दीन में न बना, दुनिया को हमारी सबसे बड़ी चिंता और ज्ञान की अंतिम सीमा न बना, और हम पर उन्हें हावी न कर जो हम पर दया नहीं करते। *

ऐ अल्लाह, हमारा कोई पाप ऐसा न छोड़ जिसे तू क्षमा न करे, कोई चिंता ऐसी न छोड़ जिसे दूर न करे, कोई कर्ज़ ऐसा न छोड़ जिसे चुका न दे और दुनिया या आख़िरत की कोई आवश्यकता ऐसी न छोड़ जिसे पूरा न करे, ऐ सबसे अधिक दयालु। *

हमारे रब, हमें दुनिया में भलाई दे और आख़िरत में भलाई दे तथा आग की यातना से बचा। अल्लाह हमारे स्वामी और नबी मुहम्मद तथा उनके उत्तम परिवार और साथियों पर दया और बहुत सलामती भेजे।

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हदीस पुस्तकालय से

हदीस
Narrated Anas: Abu Zaid died and did not leave any offspring, and he was one of the Badr warriors.
It was narrated that Malik bin Aws bin Hadathan said: "I came saying. 'Who will exchange Dirham?' Talhah bin 'Ubaidullah, who was with 'Umar bin Khattab, said: 'Show us your gold, then come to us; when our treasure comes, we will give you your silver.' 'Umar said: 'No, by Allah, you will give him silver (now), or give him back his gold, for the Messenger of Allah (ﷺ) said: "Silver for gold is usury, unless it is exchanged on the spot."'