नबी ﷺ की दुआएँ

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اللَّهُمَّ أَنْتَ رَبِّي لَا إِلَهَ إِلَّا أَنْتَ، خَلَقْتَنِي وَأَنَا عَبْدُكَ، وَأَنَا عَلَى عَهْدِكَ وَوَعْدِكَ مَا اسْتَطَعْتُ، أَعُوذُ بِكَ مِنْ شَرِّ مَا صَنَعْتُ، أَبُوءُ لَكَ بِنِعْمَتِكَ عَلَيَّ، وَأَبُوءُ بِذَنْبِي فَاغْفِرْ لِي فَإِنَّهُ لَا يَغْفِرُ الذُّنُوبَ إِلَّا أَنْتَ.
ऐ अल्लाह, तू मेरा पालनहार है, तेरे सिवा कोई सच्चा पूज्य नहीं। तूने मुझे बनाया और मैं तेरा बंदा हूँ। मैं अपनी सामर्थ्य के अनुसार तुझसे किए वचन और प्रतिज्ञा पर हूँ। मैंने जो किया उसकी बुराई से तेरी शरण माँगता हूँ। मैं अपने ऊपर तेरी नेमत और अपने पाप को स्वीकार करता हूँ; इसलिए मुझे क्षमा कर, क्योंकि तेरे सिवा कोई पापों को क्षमा नहीं करता।
رَوَاهُ الْبُخَارِيُّ (6306) عَنْ شَدَّادِ بْنِ أَوْسٍ وَقَدْ وَصَفَ النَّبِيُّ هَذَا الدُّعَاءَ بِأَنَّهُ سَيِّدُ الِاسْتِغْفَارِ.
इसे अल-बुख़ारी (6306) ने शद्दाद बिन औस से रिवायत किया है। नबी ने इस दुआ को क्षमा-याचना का सरदार कहा।
اللَّهُمَّ إِنِّي ظَلَمْتُ نَفْسِي ظُلْمًا كَثِيرًا، وَلَا يَغْفِرُ الذُّنُوبَ إِلَّا أَنْتَ، فَاغْفِرْ لِي مَغْفِرَةً مِنْ عِنْدِكَ وَارْحَمْنِي إِنَّكَ أَنْتَ الْغَفُورُ الرَّحِيمُ.
ऐ अल्लाह, मैंने अपने आप पर बहुत अत्याचार किया है और तेरे सिवा कोई पापों को क्षमा नहीं करता। अतः अपनी ओर से मुझे क्षमा कर और मुझ पर दया कर। निश्चय ही तू बहुत क्षमा करने वाला, अत्यंत दयावान है।
رَوَاهُ الْبُخَارِيُّ (834) وَمُسْلِمٌ (6869) عَنْ أَبِي بَكْرٍ.
इसे अल-बुख़ारी (834) और मुस्लिम (6869) ने अबू बक्र से रिवायत किया है।
رَبِّ اغْفِرْ لِي خَطِيئَتِي وَجَهْلِي وَإِسْرَافِي فِي أَمْرِي كُلِّهِ وَمَا أَنْتَ أَعْلَمُ بِهِ مِنِّي، اللَّهُمَّ اغْفِرْ لِي خَطَايَايَ وَعَمْدِي وَجَهْلِي وَهَزْلِي، وَكُلُّ ذَلِكَ عِنْدِي، اللَّهُمَّ اغْفِرْ لِي مَا قَدَّمْتُ وَمَا أَخَّرْتُ وَمَا أَسْرَرْتُ وَمَا أَعْلَنْتُ أَنْتَ الْمُقَدِّمُ وَأَنْتَ الْمُؤَخِّرُ وَأَنْتَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ.
ऐ मेरे पालनहार, मेरी ग़लती, मेरी अज्ञानता, मेरे सभी मामलों में मेरी अति और वह सब क्षमा कर जिसे तू मुझसे अधिक जानता है। ऐ अल्लाह, मेरी ग़लतियाँ, मेरे जानबूझकर किए कर्म, मेरी अज्ञानता और मेरा मज़ाक क्षमा कर; ये सब मुझमें हैं। ऐ अल्लाह, जो मैंने पहले और बाद में किया, जो छिपाया और जो प्रकट किया उसे क्षमा कर। तू ही आगे करने वाला और पीछे करने वाला है और तू हर चीज़ पर सर्वशक्तिमान है।
رَوَاهُ الْبُخَارِيُّ (6398) وَمُسْلِمٌ (6901) عَنْ أَبِي مُوسَى.
इसे अल-बुख़ारी (6398) और मुस्लिम (6901) ने अबू मूसा से रिवायत किया है।
اللَّهُمَّ اغْفِرْ لِي ذَنْبِي كُلَّهُ، دِقَّهُ، وَجِلَّهُ، وَأَوَّلَهُ، وَآخِرَهُ، وَعَلَانِيَتَهُ، وَسِرَّهُ.
ऐ अल्लाह, मेरे सभी पाप क्षमा कर: छोटे और बड़े, पहले और बाद के, खुले और छिपे हुए।
رَوَاهُ مُسْلِمٌ (1084) عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ.
इसे मुस्लिम (1084) ने अबू हुरैरा से रिवायत किया है।
اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنَ الْهَمِّ وَالْحَزَنِ وَالْعَجْزِ وَالْكَسَلِ وَالْجُبْنِ وَالْبُخْلِ وَضَلَعِ الدَّيْنِ وَغَلَبَةِ الرِّجَالِ.
ऐ अल्लाह, मैं चिंता और दुःख, असमर्थता और आलस्य, कायरता और कंजूसी, क़र्ज़ के बोझ और लोगों के दबाव से तेरी शरण माँगता हूँ।
رَوَاهُ الْبُخَارِيُّ (6369) عَنْ أَنَسٍ.
इसे अल-बुख़ारी (6369) ने अनस से रिवायत किया है।
اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنَ الْبُخْلِ، وَأَعُوذُ بِكَ مِنَ الْجُبْنِ، وَأَعُوذُ بِكَ أَنْ أُرَدَّ إِلَى أَرْذَلِ الْعُمُرِ، وَأَعُوذُ بِكَ مِنْ فِتْنَةِ الدُّنْيَا، وَأَعُوذُ بِكَ مِنْ عَذَابِ الْقَبْرِ.
ऐ अल्लाह, मैं कंजूसी से तेरी शरण माँगता हूँ, कायरता से तेरी शरण माँगता हूँ, सबसे निर्बल वृद्धावस्था में लौटाए जाने से तेरी शरण माँगता हूँ, दुनिया की परीक्षा से तेरी शरण माँगता हूँ और क़ब्र की यातना से तेरी शरण माँगता हूँ।
رَوَاهُ الْبُخَارِيُّ (6365) عَنْ سَعْدِ بْنِ أَبِي وَقَّاصٍ.
इसे अल-बुख़ारी (6365) ने सअद बिन अबी वक़्क़ास से रिवायत किया है।
اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنَ الْكَسَلِ وَالْهَرَمِ وَالْمَأْثَمِ وَالْمَغْرَمِ، وَمِنْ فِتْنَةِ الْقَبْرِ وَعَذَابِ الْقَبْرِ، وَمِنْ فِتْنَةِ النَّارِ وَعَذَابِ النَّارِ، وَمِنْ شَرِّ فِتْنَةِ الْغِنَى، وَأَعُوذُ بِكَ مِنْ فِتْنَةِ الْفَقْرِ، وَأَعُوذُ بِكَ مِنْ فِتْنَةِ الْمَسِيحِ الدَّجَّالِ، اللَّهُمَّ اغْسِلْ عَنِّي خَطَايَايَ بِمَاءِ الثَّلْجِ وَالْبَرَدِ، وَنَقِّ قَلْبِي مِنَ الْخَطَايَا كَمَا نَقَّيْتَ الثَّوْبَ الْأَبْيَضَ مِنَ الدَّنَسِ، وَبَاعِدْ بَيْنِي وَبَيْنَ خَطَايَايَ كَمَا بَاعَدْتَ بَيْنَ الْمَشْرِقِ وَالْمَغْرِبِ.
ऐ अल्लाह, मैं आलस्य, वृद्धावस्था, पाप और क़र्ज़ से, क़ब्र की परीक्षा और क़ब्र की यातना से, आग की परीक्षा और आग की यातना से और धन की परीक्षा की बुराई से तेरी शरण माँगता हूँ। मैं निर्धनता की परीक्षा और मसीह दज्जाल की परीक्षा से तेरी शरण माँगता हूँ। ऐ अल्लाह, मेरे पापों को बर्फ़ और ओलों के पानी से धो दे और मेरे दिल को ग़लतियों से ऐसे साफ़ कर जैसे तूने सफ़ेद कपड़े को मैल से साफ़ किया। मुझे मेरी ग़लतियों से ऐसे दूर कर जैसे तूने पूरब और पश्चिम को दूर किया।
رَوَاهُ الْبُخَارِيُّ (6368) وَمُسْلِمٌ (6871) عَنْ عَائِشَةَ.
इसे अल-बुख़ारी (6368) और मुस्लिम (6871) ने आयशा से रिवायत किया है।
اللَّهُمَّ رَبَّ السَّمَوَاتِ وَرَبَّ الْأَرْضِ وَرَبَّ الْعَرْشِ الْعَظِيمِ، رَبَّنَا وَرَبَّ كُلِّ شَيْءٍ، فَالِقَ الْحَبِّ وَالنَّوَى وَمُنْزِلَ التَّوْرَاةِ وَالْإِنْجِيلِ وَالْفُرْقَانِ، أَعُوذُ بِكَ مِنْ شَرِّ كُلِّ شَيْءٍ أَنْتَ آخِذٌ بِنَاصِيَتِهِ، اللَّهُمَّ أَنْتَ الْأَوَّلُ فَلَيْسَ قَبْلَكَ شَيْءٌ، وَأَنْتَ الْآخِرُ فَلَيْسَ بَعْدَكَ شَيْءٌ، وَأَنْتَ الظَّاهِرُ فَلَيْسَ فَوْقَكَ شَيْءٌ، وَأَنْتَ الْبَاطِنُ فَلَيْسَ دُونَكَ شَيْءٌ، اقْضِ عَنَّا الدَّيْنَ وَأَغْنِنَا مِنَ الْفَقْرِ.
ऐ अल्लाह, आकाशों के पालनहार, धरती के पालनहार और महान अर्श के पालनहार, हमारे पालनहार और हर चीज़ के पालनहार, दाने और गुठली को फाड़ने वाले तथा तौरेत, इंजील और फ़ुरक़ान उतारने वाले, मैं हर उस चीज़ की बुराई से तेरी शरण माँगता हूँ जिसकी चोटी तेरे अधिकार में है। ऐ अल्लाह, तू प्रथम है, तुझसे पहले कुछ नहीं; तू अंतिम है, तेरे बाद कुछ नहीं; तू अज़-ज़ाहिर है, तेरे ऊपर कुछ नहीं; तू अल-बातिन है, तुझसे अधिक निकट कुछ नहीं। हमारा क़र्ज़ चुका दे और हमें निर्धनता से बेनियाज़ कर दे।
رَوَاهُ مُسْلِمٌ (6889) عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ.
इसे मुस्लिम (6889) ने अबू हुरैरा से रिवायत किया है।
اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنْ شَرِّ مَا عَمِلْتُ وَمِنْ شَرِّ مَا لَمْ أَعْمَلْ.
ऐ अल्लाह, मैंने जो किया है उसकी बुराई से और जो नहीं किया उसकी बुराई से तेरी शरण माँगता हूँ।
رَوَاهُ مُسْلِمٌ (6895) عَنْ عَائِشَةَ.
इसे मुस्लिम (6895) ने आयशा से रिवायत किया है।
اللَّهُمَّ أَصْلِحْ لِي دِينِي الَّذِي هُوَ عِصْمَةُ أَمْرِي، وَأَصْلِحْ لِي دُنْيَايَ الَّتِي فِيهَا مَعَاشِي، وَأَصْلِحْ لِي آخِرَتِي الَّتِي فِيهَا مَعَادِي وَاجْعَلِ الْحَيَاةَ زِيَادَةً لِي فِي كُلِّ خَيْرٍ، وَاجْعَلِ الْمَوْتَ رَاحَةً لِي مِنْ كُلِّ شَرٍّ.
ऐ अल्लाह, मेरा धर्म सुधार दे जो मेरे मामले की रक्षा है, मेरा संसार सुधार दे जिसमें मेरा जीवन है और मेरा आख़िरत सुधार दे जहाँ मुझे लौटना है। जीवन को मेरे लिए हर भलाई में वृद्धि बना और मृत्यु को हर बुराई से विश्राम बना।
رَوَاهُ مُسْلِمٌ (6903) عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ.
इसे मुस्लिम (6903) ने अबू हुरैरा से रिवायत किया है।
اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ الْهُدَى وَالتُّقَى وَالْعَفَافَ وَالْغِنَى.
ऐ अल्लाह, मैं तुझसे मार्गदर्शन, परहेज़गारी, पवित्रता और आत्मनिर्भरता माँगता हूँ।
رَوَاهُ مُسْلِمٌ (6904) عَنِ ابْنِ مَسْعُودٍ.
इसे मुस्लिम (6904) ने इब्न मसऊद से रिवायत किया है।
اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنَ الْعَجْزِ وَالْكَسَلِ، وَالْجُبْنِ وَالْبُخْلِ، وَالْهَرَمِ وَعَذَابِ الْقَبْرِ، اللَّهُمَّ آتِ نَفْسِي تَقْوَاهَا وَزَكِّهَا أَنْتَ خَيْرُ مَنْ زَكَّاهَا، أَنْتَ وَلِيُّهَا وَمَوْلَاهَا، اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنْ عِلْمٍ لَا يَنْفَعُ، وَمِنْ قَلْبٍ لَا يَخْشَعُ، وَمِنْ نَفْسٍ لَا تَشْبَعُ، وَمِنْ دَعْوَةٍ لَا يُسْتَجَابُ لَهَا.
ऐ अल्लाह, मैं असमर्थता और आलस्य, कायरता और कंजूसी, वृद्धावस्था और क़ब्र की यातना से तेरी शरण माँगता हूँ। ऐ अल्लाह, मेरे मन को परहेज़गारी दे और उसे पवित्र कर; तू सबसे अच्छा पवित्र करने वाला, उसका संरक्षक और स्वामी है। ऐ अल्लाह, मैं लाभ न देने वाले ज्ञान, विनम्र न होने वाले दिल, न भरने वाले मन और स्वीकार न होने वाली दुआ से तेरी शरण माँगता हूँ।
رَوَاهُ مُسْلِمٌ (6906) عَنْ زَيْدِ بْنِ أَرْقَمَ.
इसे मुस्लिम (6906) ने ज़ैद बिन अरक़म से रिवायत किया है।
اللَّهُمَّ لَكَ أَسْلَمْتُ وَبِكَ آمَنْتُ، وَعَلَيْكَ تَوَكَّلْتُ وَإِلَيْكَ أَنَبْتُ وَبِكَ خَاصَمْتُ، اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِعِزَّتِكَ لَا إِلَهَ إِلَّا أَنْتَ أَنْ تُضِلَّنِي، أَنْتَ الْحَيُّ الَّذِي لَا يَمُوتُ وَالْجِنُّ وَالْإِنْسُ يَمُوتُونَ.
ऐ अल्लाह, मैं तेरे प्रति समर्पित हुआ, तुझ पर ईमान लाया, तुझ पर भरोसा किया, तेरी ओर लौटा और तेरी सहायता से तर्क किया। ऐ अल्लाह, मैं तेरी प्रभुता की शरण माँगता हूँ कि तू मुझे पथभ्रष्ट न करे; तेरे सिवा कोई सच्चा पूज्य नहीं। तू जीवित है और नहीं मरता, जबकि जिन्न और मनुष्य मरते हैं।
رَوَاهُ الْبُخَارِيُّ (7383) وَمُسْلِمٌ (6899) عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ.
इसे अल-बुख़ारी (7383) और मुस्लिम (6899) ने इब्न अब्बास से रिवायत किया है।
اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنْ زَوَالِ نِعْمَتِكَ وَتَحَوُّلِ عَافِيَتِكَ وَفُجَاءَةِ نِقْمَتِكَ وَجَمِيعِ سَخَطِكَ.
ऐ अल्लाह, मैं तेरी नेमत के छिन जाने, तेरे दिए हुए स्वास्थ्य के बदल जाने, तेरी अचानक सज़ा और तेरे हर प्रकार के क्रोध से तेरी शरण माँगता हूँ।
رَوَاهُ مُسْلِمٌ (6943) عَنِ ابْنِ عُمَرَ.
इसे मुस्लिम (6943) ने इब्न उमर से रिवायत किया है।
اللَّهُمَّ مُصَرِّفَ الْقُلُوبِ صَرِّفْ قُلُوبَنَا عَلَى طَاعَتِكَ.
ऐ अल्लाह, दिलों को फेरने वाले, हमारे दिलों को अपनी आज्ञा के पालन की ओर फेर दे।
رَوَاهُ مُسْلِمٌ (6750) عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عَمْرٍو.
इसे मुस्लिम (6750) ने अब्दुल्लाह बिन अम्र से रिवायत किया है।
اللَّهُمَّ رَبَّ جَبْرَائِيلَ وَمِيكَائِيلَ وَإِسْرَافِيلَ، فَاطِرَ السَّمَوَاتِ وَالْأَرْضِ، عَالِمَ الْغَيْبِ وَالشَّهَادَةِ، أَنْتَ تَحْكُمُ بَيْنَ عِبَادِكَ فِيمَا كَانُوا فِيهِ يَخْتَلِفُونَ، اهْدِنِي لِمَا اخْتُلِفَ فِيهِ مِنَ الْحَقِّ بِإِذْنِكَ، إِنَّكَ تَهْدِي مَنْ تَشَاءُ إِلَى صِرَاطٍ مُسْتَقِيمٍ.
ऐ अल्लाह, जिब्रील, मीकाईल और इस्राफ़ील के पालनहार, आकाशों और धरती के रचयिता, छिपे और प्रकट को जानने वाले, तू अपने बंदों के बीच उनके मतभेदों का फ़ैसला करता है। अपनी अनुमति से जिस सत्य में मतभेद हुआ उसमें मुझे मार्गदर्शन दे; निश्चय ही तू जिसे चाहता है सीधे मार्ग की ओर मार्गदर्शन देता है।
رَوَاهُ مُسْلِمٌ (1811) عَنْ عَائِشَةَ.
इसे मुस्लिम (1811) ने आयशा से रिवायत किया है।
اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِرِضَاكَ مِنْ سَخَطِكَ، وَبِمُعَافَاتِكَ مِنْ عُقُوبَتِكَ، وَأَعُوذُ بِكَ مِنْكَ، لَا أُحْصِي ثَنَاءً عَلَيْكَ، أَنْتَ كَمَا أَثْنَيْتَ عَلَى نَفْسِكَ.
ऐ अल्लाह, मैं तेरी प्रसन्नता की शरण तेरे क्रोध से और तेरी सुरक्षा की शरण तेरी सज़ा से माँगता हूँ; मैं तुझसे तेरी शरण माँगता हूँ। मैं तेरी प्रशंसा की गणना नहीं कर सकता; तू वैसा है जैसा तूने स्वयं अपनी प्रशंसा की है।
رَوَاهُ مُسْلِمٌ (1090) عَنْ عَائِشَةَ.
इसे मुस्लिम (1090) ने आयशा से रिवायत किया है।
اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنْ جَهْدِ الْبَلَاءِ وَدَرَكِ الشَّقَاءِ وَسُوءِ الْقَضَاءِ وَشَمَاتَةِ الْأَعْدَاءِ.
ऐ अल्लाह, मैं कठिन विपत्ति, दुर्भाग्य के आ पहुँचने, बुरे फ़ैसले और शत्रुओं की ख़ुशी से तेरी शरण माँगता हूँ।
رَوَاهُ الْبُخَارِيُّ (6347) وَمُسْلِمٌ (6877) عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ.
इसे अल-बुख़ारी (6347) और मुस्लिम (6877) ने अबू हुरैरा से रिवायत किया है।
اللَّهُمَّ اجْعَلْ لِي فِي قَلْبِي نُورًا، وَفِي لِسَانِي نُورًا، وَفِي سَمْعِي نُورًا، وَفِي بَصَرِي نُورًا، وَمِنْ فَوْقِي نُورًا، وَمِنْ تَحْتِي نُورًا، وَعَنْ يَمِينِي نُورًا، وَعَنْ شِمَالِي نُورًا، وَمِنْ بَيْنِ يَدَيَّ نُورًا، وَمِنْ خَلْفِي نُورًا، وَاجْعَلْ فِي نَفْسِي نُورًا، وَأَعْظِمْ لِي نُورًا.
ऐ अल्लाह, मेरे दिल में प्रकाश रख, मेरी ज़बान में प्रकाश, मेरे कान में प्रकाश और मेरी आँख में प्रकाश रख; मेरे ऊपर और नीचे, दाएँ और बाएँ, आगे और पीछे प्रकाश रख। मेरे भीतर प्रकाश रख और मेरे लिए प्रकाश बढ़ा दे।
رَوَاهُ الْبُخَارِيُّ (6316) وَمُسْلِمٌ (1797) عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ.
इसे अल-बुख़ारी (6316) और मुस्लिम (1797) ने इब्न अब्बास से रिवायत किया है।
اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ مِنَ الْخَيْرِ كُلِّهِ عَاجِلِهِ وَآجِلِهِ مَا عَلِمْتُ مِنْهُ وَمَا لَمْ أَعْلَمْ، وَأَعُوذُ بِكَ مِنَ الشَّرِّ كُلِّهِ عَاجِلِهِ وَآجِلِهِ مَا عَلِمْتُ مِنْهُ وَمَا لَمْ أَعْلَمْ، اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ مِنْ خَيْرِ مَا سَأَلَكَ عَبْدُكَ وَنَبِيُّكَ، وَأَعُوذُ بِكَ مِنْ شَرِّ مَا عَاذَ بِهِ عَبْدُكَ وَنَبِيُّكَ، اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ الْجَنَّةَ وَمَا قَرَّبَ إِلَيْهَا مِنْ قَوْلٍ أَوْ عَمَلٍ، وَأَعُوذُ بِكَ مِنَ النَّارِ وَمَا قَرَّبَ إِلَيْهَا مِنْ قَوْلٍ أَوْ عَمَلٍ وَأَسْأَلُكَ أَنْ تَجْعَلَ كُلَّ قَضَاءٍ قَضَيْتَهُ لِي خَيْرًا.
ऐ अल्लाह, मैं तुझसे सारी भलाई माँगता हूँ, तुरंत मिलने वाली और बाद में मिलने वाली, जिसे मैं जानता हूँ और जिसे नहीं जानता। मैं सारी बुराई से तेरी शरण माँगता हूँ, तुरंत आने वाली और बाद में आने वाली, जिसे मैं जानता हूँ और जिसे नहीं जानता। ऐ अल्लाह, मैं तुझसे वह भलाई माँगता हूँ जो तेरे बंदे और नबी ने तुझसे माँगी और उस बुराई से तेरी शरण माँगता हूँ जिससे तेरे बंदे और नबी ने तेरी शरण माँगी। ऐ अल्लाह, मैं तुझसे जन्नत और उसके निकट करने वाले वचन या कर्म माँगता हूँ और आग तथा उसके निकट करने वाले वचन या कर्म से तेरी शरण माँगता हूँ। मैं तुझसे माँगता हूँ कि तू मेरे लिए जो भी फ़ैसला करे उसे अच्छा बना दे।
رَوَاهُ ابْنُ مَاجَهْ (3846) بِإِسْنَادٍ صَحِيحٍ عَنْ عَائِشَةَ.
इसे इब्न माजा (3846) ने आयशा से सहीह सनद के साथ रिवायत किया है।
اللَّهُمَّ بِعِلْمِكَ الْغَيْبَ وَقُدْرَتِكَ عَلَى الْخَلْقِ أَحْيِنِي مَا عَلِمْتَ الْحَيَاةَ خَيْرًا لِي، وَتَوَفَّنِي إِذَا عَلِمْتَ الْوَفَاةَ خَيْرًا لِي، اللَّهُمَّ وَأَسْأَلُكَ خَشْيَتَكَ فِي الْغَيْبِ وَالشَّهَادَةِ، وَأَسْأَلُكَ كَلِمَةَ الْحَقِّ فِي الرِّضَا وَالْغَضَبِ، وَأَسْأَلُكَ الْقَصْدَ فِي الْفَقْرِ وَالْغِنَى، وَأَسْأَلُكَ نَعِيمًا لَا يَنْفَدُ، وَأَسْأَلُكَ قُرَّةَ عَيْنٍ لَا تَنْقَطِعُ، وَأَسْأَلُكَ الرِّضَاءَ بَعْدَ الْقَضَاءِ، وَأَسْأَلُكَ بَرْدَ الْعَيْشِ بَعْدَ الْمَوْتِ، وَأَسْأَلُكَ لَذَّةَ النَّظَرِ إِلَى وَجْهِكَ وَالشَّوْقَ إِلَى لِقَائِكَ فِي غَيْرِ ضَرَّاءَ مُضِرَّةٍ وَلَا فِتْنَةٍ مُضِلَّةٍ، اللَّهُمَّ زَيِّنَّا بِزِينَةِ الْإِيمَانِ، وَاجْعَلْنَا هُدَاةً مُهْتَدِينَ.
ऐ अल्लाह, तेरे अदृश्य के ज्ञान और सृष्टि पर तेरी शक्ति के माध्यम से मैं तुझसे माँगता हूँ: जब तक तू जीवन को मेरे लिए बेहतर जाने, मुझे जीवित रख, और जब तू मृत्यु को मेरे लिए बेहतर जाने, मुझे मृत्यु दे। ऐ अल्लाह, मैं एकांत और लोगों के सामने तेरा भय माँगता हूँ; प्रसन्नता और क्रोध में सत्य वचन माँगता हूँ; निर्धनता और समृद्धि में संयम माँगता हूँ। मैं ऐसी नेमत माँगता हूँ जो समाप्त न हो और आँखों की ऐसी ठंडक जो कभी न टूटे। मैं तेरे निर्णय के बाद संतोष और मृत्यु के बाद सुखद जीवन माँगता हूँ। मैं तेरे चेहरे को देखने का आनंद और तुझसे मिलने की चाह माँगता हूँ, ऐसी हानिकारक विपत्ति और पथभ्रष्ट करने वाली परीक्षा के बिना। ऐ अल्लाह, हमें ईमान की सुंदरता से सजा दे और हमें मार्गदर्शन पाने वाले तथा मार्गदर्शन देने वाले बना।
رَوَاهُ النَّسَائِيُّ (1305) بِإِسْنَادٍ حَسَنٍ عَنْ عَمَّارِ بْنِ يَاسِرٍ.
इसे अन-नसाई (1305) ने अम्मार बिन यासिर से हसन सनद के साथ रिवायत किया है।
اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ الْعَفْوَ وَالْعَافِيَةَ فِي الدُّنْيَا وَالْآخِرَةِ، اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ الْعَفْوَ وَالْعَافِيَةَ فِي دِينِي وَدُنْيَايَ وَأَهْلِي وَمَالِي، اللَّهُمَّ اسْتُرْ عَوْرَاتِي وَآمِنْ رَوْعَاتِي، وَاحْفَظْنِي مِنْ بَيْنِ يَدَيَّ وَمِنْ خَلْفِي وَعَنْ يَمِينِي وَعَنْ شِمَالِي وَمِنْ فَوْقِي، وَأَعُوذُ بِعَظَمَتِكَ أَنْ أُغْتَالَ مِنْ تَحْتِي.
ऐ अल्लाह, मैं तुझसे दुनिया और आख़िरत में क्षमा और कल्याण माँगता हूँ। ऐ अल्लाह, मैं तुझसे अपने धर्म, संसार, परिवार और धन में क्षमा और कल्याण माँगता हूँ। ऐ अल्लाह, मेरे दोषों को ढँक दे और मेरे भय को शांति दे। मेरे आगे, पीछे, दाएँ, बाएँ और ऊपर से मेरी रक्षा कर। मैं तेरी महानता की शरण माँगता हूँ कि मुझे नीचे से अचानक नष्ट न किया जाए।
رَوَاهُ أَبُو دَاوُدَ (5074) وَغَيْرُهُ بِإِسْنَادٍ صَحِيحٍ عَنِ ابْنِ عُمَرَ.
इसे अबू दाऊद (5074) और अन्य ने इब्न उमर से सहीह सनद के साथ रिवायत किया है।
اللَّهُمَّ عَالِمَ الْغَيْبِ وَالشَّهَادَةِ، فَاطِرَ السَّمَوَاتِ وَالْأَرْضِ، رَبَّ كُلِّ شَيْءٍ وَمَلِيكَهُ، أَشْهَدُ أَنْ لَا إِلَهَ إِلَّا أَنْتَ، أَعُوذُ بِكَ مِنْ شَرِّ نَفْسِي وَشَرِّ الشَّيْطَانِ وَشِرْكِهِ.
ऐ अल्लाह, छिपे और प्रकट को जानने वाले, आकाशों और धरती के रचयिता, हर चीज़ के पालनहार और स्वामी, मैं गवाही देता हूँ कि तेरे सिवा कोई सच्चा पूज्य नहीं। मैं अपने मन की बुराई, शैतान की बुराई और उसके शिर्क से तेरी शरण माँगता हूँ।
رَوَاهُ التِّرْمِذِيُّ (3392) وَغَيْرُهُ بِإِسْنَادٍ صَحِيحٍ عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ.
इसे अत-तिर्मिज़ी (3392) और अन्य ने अबू हुरैरा से सहीह सनद के साथ रिवायत किया है।
اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ الثَّبَاتَ فِي الْأَمْرِ، وَالْعَزِيمَةَ عَلَى الرُّشْدِ، وَأَسْأَلُكَ مُوجِبَاتِ رَحْمَتِكَ، وَعَزَائِمَ مَغْفِرَتِكَ، وَأَسْأَلُكَ شُكْرَ نِعْمَتِكَ، وَحُسْنَ عِبَادَتِكَ، وَأَسْأَلُكَ قَلْبًا سَلِيمًا، وَلِسَانًا صَادِقًا، وَأَسْأَلُكَ مِنْ خَيْرِ مَا تَعْلَمُ، وَأَعُوذُ بِكَ مِنْ شَرِّ مَا تَعْلَمُ، وَأَسْتَغْفِرُكَ لِمَا تَعْلَمُ، إِنَّكَ أَنْتَ عَلَّامُ الْغُيُوبِ.
ऐ अल्लाह, मैं तुझसे कार्य में दृढ़ता और सही मार्ग पर चलने का संकल्प माँगता हूँ। मैं तेरी दया प्राप्त करने वाले कारण और तेरी क्षमा निश्चित करने वाले कर्म माँगता हूँ। मैं तेरी नेमत का शुक्र और उत्तम इबादत माँगता हूँ। मैं तुझसे निर्मल दिल और सच्ची ज़बान माँगता हूँ। जो भलाई तू जानता है वह माँगता हूँ, जिस बुराई को तू जानता है उससे तेरी शरण माँगता हूँ और जो तू जानता है उसके लिए क्षमा माँगता हूँ। निश्चय ही तू छिपी बातों को खूब जानने वाला है।
رَوَاهُ الطَّبَرَانِيُّ فِي "الْكَبِيرِ" (7135) عَنْ شَدَّادِ بْنِ أَوْسٍ.
इसे अत-तबरानी ने अल-कबीर (7135) में शद्दाद बिन औस से रिवायत किया है।
اللَّهُمَّ اكْفِنِي بِحَلَالِكَ عَنْ حَرَامِكَ وَأَغْنِنِي بِفَضْلِكَ عَمَّنْ سِوَاكَ.
ऐ अल्लाह, जो तूने हलाल किया है उसे मेरे लिए पर्याप्त कर दे ताकि मैं हराम से बचूँ, और अपने अनुग्रह से मुझे अपने सिवा सबसे बेनियाज़ कर दे।
رَوَاهُ التِّرْمِذِيُّ (3563) بِإِسْنَادٍ حَسَنٍ عَنْ عَلِيٍّ.
इसे अत-तिर्मिज़ी (3563) ने अली से हसन सनद के साथ रिवायत किया है।
اللَّهُمَّ عَافِنِي فِي بَدَنِي، اللَّهُمَّ عَافِنِي فِي سَمْعِي، اللَّهُمَّ عَافِنِي فِي بَصَرِي، لَا إِلَهَ إِلَّا أَنْتَ، اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنَ الْكُفْرِ وَالْفَقْرِ، اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنْ عَذَابِ الْقَبْرِ، لَا إِلَهَ إِلَّا أَنْتَ.
ऐ अल्लाह, मेरे शरीर को स्वास्थ्य दे। ऐ अल्लाह, मेरी सुनने की शक्ति को स्वास्थ्य दे। ऐ अल्लाह, मेरी दृष्टि को स्वास्थ्य दे। तेरे सिवा कोई सच्चा पूज्य नहीं। ऐ अल्लाह, मैं कुफ़्र और निर्धनता से तेरी शरण माँगता हूँ। ऐ अल्लाह, मैं क़ब्र की यातना से तेरी शरण माँगता हूँ। तेरे सिवा कोई सच्चा पूज्य नहीं।
رَوَاهُ أَبُو دَاوُدَ (5090) بِإِسْنَادٍ حَسَنٍ عَنْ أَبِي بَكْرَةَ.
इसे अबू दाऊद (5090) ने अबू बकरा से हसन सनद के साथ रिवायत किया है।
رَبِّ أَعِنِّي وَلَا تُعِنْ عَلَيَّ، وَانْصُرْنِي وَلَا تَنْصُرْ عَلَيَّ، وَامْكُرْ لِي وَلَا تَمْكُرْ عَلَيَّ، وَاهْدِنِي وَيَسِّرِ الْهُدَى لِي، وَانْصُرْنِي عَلَى مَنْ بَغَى عَلَيَّ، رَبِّ اجْعَلْنِي لَكَ شَكَّارًا، لَكَ ذَكَّارًا، لَكَ رَهَّابًا، لَكَ مِطْوَاعًا، لَكَ مُخْبِتًا إِلَيْكَ أَوَّاهًا مُنِيبًا، رَبِّ تَقَبَّلْ تَوْبَتِي وَاغْسِلْ حَوْبَتِي وَأَجِبْ دَعْوَتِي وَثَبِّتْ حُجَّتِي وَسَدِّدْ لِسَانِي وَاهْدِ قَلْبِي وَاسْلُلْ سَخِيمَةَ صَدْرِي.
ऐ मेरे पालनहार, मेरी सहायता कर और मेरे विरुद्ध सहायता न कर; मुझे विजय दे और मेरे विरुद्ध विजय न दे; मेरे लिए योजना बना और मेरे विरुद्ध योजना न बना। मुझे मार्गदर्शन दे, मेरे लिए मार्गदर्शन आसान कर और मेरे ऊपर अत्याचार करने वाले के विरुद्ध मेरी सहायता कर। ऐ मेरे पालनहार, मुझे अपना बहुत शुक्र करने वाला, तुझे बहुत याद करने वाला, तुझसे डरने वाला, तेरा आज्ञाकारी, तेरे सामने विनम्र, तेरी ओर आहें भरने वाला और तेरी ओर लौटने वाला बना। ऐ मेरे पालनहार, मेरा पश्चाताप स्वीकार कर, मेरे पाप को धो दे, मेरी दुआ स्वीकार कर, मेरे तर्क को दृढ़ कर, मेरी ज़बान को सही कर, मेरे दिल को मार्गदर्शन दे और मेरे सीने का द्वेष निकाल दे।
رَوَاهُ التِّرْمِذِيُّ (3551) وَغَيْرُهُ بِإِسْنَادٍ صَحِيحٍ عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ.
इसे अत-तिर्मिज़ी (3551) और अन्य ने इब्न अब्बास से सहीह सनद के साथ रिवायत किया है।
اللَّهُمَّ لَكَ الْحَمْدُ كُلُّهُ، اللَّهُمَّ لَا قَابِضَ لِمَا بَسَطْتَ، وَلَا بَاسِطَ لِمَا قَبَضْتَ، وَلَا هَادِيَ لِمَا أَضْلَلْتَ، وَلَا مُضِلَّ لِمَنْ هَدَيْتَ، وَلَا مُعْطِيَ لِمَا مَنَعْتَ، وَلَا مَانِعَ لِمَا أَعْطَيْتَ، وَلَا مُقَرِّبَ لِمَا بَاعَدْتَ، وَلَا مُبَاعِدَ لِمَا قَرَّبْتَ، اللَّهُمَّ ابْسُطْ عَلَيْنَا مِنْ بَرَكَاتِكَ وَرَحْمَتِكَ وَفَضْلِكَ وَرِزْقِكَ، اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ النَّعِيمَ الْمُقِيمَ الَّذِي لَا يَحُولُ وَلَا يَزُولُ، اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ النَّعِيمَ يَوْمَ الْعَيْلَةِ، وَالْأَمْنَ يَوْمَ الْخَوْفِ، اللَّهُمَّ إِنِّي عَائِذٌ بِكَ مِنْ شَرِّ مَا أَعْطَيْتَنَا وَشَرِّ مَا مَنَعْتَ، اللَّهُمَّ حَبِّبْ إِلَيْنَا الْإِيمَانَ وَزَيِّنْهُ فِي قُلُوبِنَا، وَكَرِّهْ إِلَيْنَا الْكُفْرَ وَالْفُسُوقَ وَالْعِصْيَانَ، وَاجْعَلْنَا مِنَ الرَّاشِدِينَ، اللَّهُمَّ تَوَفَّنَا مُسْلِمِينَ، وَأَحْيِنَا مُسْلِمِينَ، وَأَلْحِقْنَا بِالصَّالِحِينَ غَيْرَ خَزَايَا وَلَا مَفْتُونِينَ، اللَّهُمَّ قَاتِلْ الْكَفَرَةَ الَّذِينَ يُكَذِّبُونَ رُسُلَكَ، وَيَصُدُّونَ عَنْ سَبِيلِكَ، وَاجْعَلْ عَلَيْهِمْ رِجْزَكَ وَعَذَابَكَ، اللَّهُمَّ قَاتِلْ الْكَفَرَةَ الَّذِينَ أُوتُوا الْكِتَابَ إِلَهَ الْحَقِّ.
ऐ अल्लाह, सारी प्रशंसा तेरे लिए है। ऐ अल्लाह, जिसे तू फैलाए उसे कोई समेट नहीं सकता और जिसे तू समेटे उसे कोई फैला नहीं सकता। जिसे तू पथभ्रष्ट करे उसे कोई मार्गदर्शन नहीं दे सकता और जिसे तू मार्गदर्शन दे उसे कोई पथभ्रष्ट नहीं कर सकता। जिसे तू रोके उसे कोई दे नहीं सकता और जिसे तू दे उसे कोई रोक नहीं सकता। जिसे तू दूर करे उसे कोई निकट नहीं कर सकता और जिसे तू निकट करे उसे कोई दूर नहीं कर सकता। ऐ अल्लाह, हम पर अपनी बरकत, दया, अनुग्रह और आजीविका फैला दे। ऐ अल्लाह, मैं तुझसे स्थायी नेमत माँगता हूँ जो न बदले और न समाप्त हो। ऐ अल्लाह, मैं तुझसे अभाव के दिन सुख और भय के दिन सुरक्षा माँगता हूँ। ऐ अल्लाह, जो तूने हमें दिया उसकी बुराई और जो तूने रोका उसकी बुराई से मैं तेरी शरण माँगता हूँ। ऐ अल्लाह, ईमान को हमें प्रिय बना और हमारे दिलों में उसे सुंदर बना; कुफ़्र, अवज्ञा और पाप को हमारे लिए अप्रिय बना और हमें सही राह पाने वालों में कर दे। ऐ अल्लाह, हमें मुसलमान की अवस्था में मृत्यु दे, मुसलमान की अवस्था में जीवित रख और हमें नेक लोगों के साथ मिला, बिना अपमानित हुए और बिना परीक्षा में भटके। ऐ अल्लाह, उन इनकार करने वालों से लड़ जो तेरे रसूलों को झुठलाते और तेरे मार्ग से रोकते हैं; उन पर अपनी सज़ा और यातना उतार। ऐ अल्लाह, उन इनकार करने वालों से लड़ जिन्हें किताब दी गई, ऐ सत्य के पूज्य।
رَوَاهُ الْإِمَامُ أَحْمَدُ (15492) عَنْ رِفَاعَةَ الزُّرَقِيِّ بِإِسْنَادٍ صَحِيحٍ.
इसे इमाम अहमद (15492) ने रिफ़ाआ अज़-ज़ुरक़ी से सहीह सनद के साथ रिवायत किया है।
اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى مُحَمَّدٍ وَعَلَى آلِ مُحَمَّدٍ كَمَا صَلَّيْتَ عَلَى إِبْرَاهِيمَ وَعَلَى آلِ إِبْرَاهِيمَ، إِنَّكَ حَمِيدٌ مَجِيدٌ، اللَّهُمَّ بَارِكْ عَلَى مُحَمَّدٍ وَعَلَى آلِ مُحَمَّدٍ كَمَا بَارَكْتَ عَلَى إِبْرَاهِيمَ وَعَلَى آلِ إِبْرَاهِيمَ إِنَّكَ حَمِيدٌ مَجِيدٌ.
ऐ अल्लाह, मुहम्मद और मुहम्मद के परिवार पर सलावत नाज़िल फ़रमा जैसे तूने इब्राहीम और इब्राहीम के परिवार पर सलावत नाज़िल फ़रमाई। निश्चय ही तू प्रशंसित और महान है। ऐ अल्लाह, मुहम्मद और मुहम्मद के परिवार पर बरकत नाज़िल फ़रमा जैसे तूने इब्राहीम और इब्राहीम के परिवार पर बरकत नाज़िल फ़रमाई। निश्चय ही तू प्रशंसित और महान है।
رَوَاهُ الْبُخَارِيُّ (3370) وَمُسْلِمٌ (908) عَنْ كَعْبِ بْنِ عُجْرَةَ.
इसे अल-बुख़ारी (3370) और मुस्लिम (908) ने कअब बिन उजरा से रिवायत किया है।
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हदीस पुस्तकालय से

हदीस
It was narrated from Abu Hurairah that the Prophet (ﷺ) said: "There is a surah in the Qur'an, with thirty verses, which will intercede for its companion (the one who recites it) until he is forgiven: Tabarakal-ladhi bi yadihil mulk (Blessed is He in Whose Hand is the Dominion)."
It was narrated from Ibn Abbas that the : Messenger of Allah (ﷺ) passed by a man in Makkah who was standing in the sun. He said: "What is this?" They said: "He vowed to fast and not to seek shade until night comes, and not to speak, and to remain standing." He said: "Let him speak and seek shade and let him sit down, but let him complete his fast."Another chain from Ibn 'Abbas, from the Prophet (ﷺ), with similar wording. expiation for breaking an oath."