सुबह के अज़कार
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ
قُلْ هُوَ اللَّهُ أَحَدٌ، اللَّهُ الصَّمَدُ، لَمْ يَلِدْ وَلَمْ يُولَدْ، وَلَمْ يَكُن لَّهُ كُفُوًا أَحَدٌ.अल्लाह के नाम से, जो अत्यंत कृपाशील और दयावान है
कह दो: वह अल्लाह एक है। अल्लाह सबकी आवश्यकता पूरी करने वाला और स्वयं निरपेक्ष है। न उसने किसी को जना और न वह जना गया, और कोई उसका समकक्ष नहीं है।مَنْ قَالَهَا حِينَ يُصْبِحُ وَحِينَ يُمْسِي كَفَتْهُ مِنْ كُلِّ شَيْءٍ (الْإِخْلَاصِ وَالْمُعَوِّذَتَيْنِ).
जो इन्हें सुबह और शाम पढ़े, उसके लिए ये हर चीज़ से पर्याप्त हैं: सूरा अल-इख़लास और दोनों सुरक्षा की सूराएँ।
व्याख्या और स्रोत
فِي أَذْكَارِ الصَّبَاحِ وَالْمَسَاءِ نَقْرَأُ سُوَرَ الْإِخْلَاصِ، وَالْمُعَوِّذَتَيْنِ. ثَلَاثَ مَرَّاتٍ.
هَلْ نَقْرَأُ كُلَّ سُورَةٍ ثَلَاثًا، أَمْ نَقْرَأُ الْإِخْلَاصَ مَرَّةً ثُمَّ الْفَلَقَ مَرَّةً، ثُمَّ النَّاسَ مَرَّةً، ثُمَّ نُكَرِّرُ مَرَّتَيْنِ؟
فَلَمْ نَطَّلِعْ عَلَى نَصٍّ فِي الْمَسْأَلَةِ يُعَيِّنُ أَحَدَ الْأَمْرَيْنِ، وَلَكِنَّ الظَّاهِرَ أَنَّ الْأَوْلَى أَنْ تَقْرَأَ السُّوَرَ الثَّلَاثَ مَرَّةً ثُمَّ تُعِيدَ قِرَاءَتَهَا مَعَ بَعْضٍ مَرَّتَيْنِ، وَيَدُلُّ لِهَذَا أَنَّهُ ثَبَتَ عَنِ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فِي أَذْكَارِ النَّوْمِ أَنَّهُ كَانَ إِذَا أَوَى إِلَى فِرَاشِهِ كُلَّ لَيْلَةٍ جَمَعَ كَفَّيْهِ ثُمَّ نَفَثَ فِيهِمَا فَقَرَأَ فِيهِمَا: قُلْ هُوَ اللَّهُ أَحَدٌ، وَقُلْ أَعُوذُ بِرَبِّ الْفَلَقِ، وَقُلْ أَعُوذُ بِرَبِّ النَّاسِ، ثُمَّ يَمْسَحُ بِهِمَا مَا اسْتَطَاعَ مِنْ جَسَدِهِ يَبْدَأُ بِهِمَا عَلَى رَأْسِهِ وَوَجْهِهِ، وَمَا أَقْبَلَ مِنْ جَسَدِهِ. يَفْعَلُ ذَلِكَ ثَلَاثَ مَرَّاتٍ. رَوَاهُ الْبُخَارِيُّ
وَثَبَتَ عَنْهُ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ أَنَّهُ قَالَ لِفُقَرَاءِ الْمُهَاجِرِينَ: تُسَبِّحُونَ وَتَحْمَدُونَ وَتُكَبِّرُونَ خَلْفَ كُلِّ صَلَاةٍ ثَلَاثًا وَثَلَاثِينَ. مُتَّفَقٌ عَلَيْهِ.
وَقَالَ أَبُو صَالِحٍ الرَّاوِي عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ لَمَّا سُئِلَ عَنْ كَيْفِيَّةِ ذِكْرِهِنَّ قَالَ: يَقُولُ: سُبْحَانَ اللَّهِ، وَالْحَمْدُ لِلَّهِ، وَاللَّهُ أَكْبَرُ. حَتَّى يَكُونَ مِنْهُنَّ كُلِّهِنَّ ثَلَاثًا وَثَلَاثِينَ، كَذَا فِي الصَّحِيحِ عَنِ ابْنِ صَالِحٍ.
وَقَدْ رَجَّحَ ابْنُ حَجَرٍ أَنَّ كِلَا الْأَمْرَيْنِ حَسَنٌ وَمَالَ إِلَى أَفْضَلِيَّةِ الْإِفْرَادِ، وَذَكَرَ فِي ذَلِكَ حُجَجًا مِنْهَا حَدِيثُ زَيْدِ بْنِ ثَابِتٍ: أُمِرْنَا أَنْ نُسَبِّحَ فِي دُبُرِ كُلِّ صَلَاةٍ ثَلَاثًا وَثَلَاثِينَ، وَنَحْمَدَ ثَلَاثًا وَثَلَاثِينَ، وَنُكَبِّرَ أَرْبَعًا وَثَلَاثِينَ. وَالْحَدِيثُ رَوَاهُ الْحَاكِمُ وَصَحَّحَهُ وَوَافَقَهُ الذَّهَبِيُّ. وَفِي حَدِيثِ مُسْلِمٍ: مَنْ سَبَّحَ فِي دُبُرِ كُلِّ صَلَاةٍ ثَلَاثًا وَثَلَاثِينَ، وَحَمِدَ اللَّهَ ثَلَاثًا وَثَلَاثِينَ، وَكَبَّرَ اللَّهَ ثَلَاثًا وَثَلَاثِينَ، وَقَالَ تَمَامَ الْمِائَةِ: لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ وَحْدَهُ لَا شَرِيكَ لَهُ، لَهُ الْمُلْكُ وَلَهُ الْحَمْدُ وَهُوَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ. غُفِرَتْ خَطَايَاهُ وَإِنْ كَانَتْ مِثْلَ زَبَدِ الْبَحْرِ.
فَحَدِيثُ أَذْكَارِ النَّوْمِ السَّابِقُ فِي الْمُعَوِّذَاتِ ظَاهِرُهُ الْجَمْعُ بَيْنَ السُّوَرِ، وَإِعَادَتُهَا مَجْمُوعَةً ثَلَاثًا، وَأَمَّا أَحَادِيثُ التَّسْبِيحَاتِ فَالظَّاهِرُ أَنَّ الْأَفْضَلَ هُوَ تَفْرِيقُهَا، فَلَوْ أَنَّ الْإِنْسَانَ جَمَعَ أَوْ فَرَّقَ فَالظَّاهِرُ أَنَّ الْكُلَّ لَا حَرَجَ فِيهِ، وَالْأَوْلَى إِلْحَاقُ الْمُعَوِّذَاتِ مَسَاءً وَصَبَاحًا بِالْمُعَوِّذَاتِ فِي أَذْكَارِ النَّوْمِ.
هَلْ نَقْرَأُ كُلَّ سُورَةٍ ثَلَاثًا، أَمْ نَقْرَأُ الْإِخْلَاصَ مَرَّةً ثُمَّ الْفَلَقَ مَرَّةً، ثُمَّ النَّاسَ مَرَّةً، ثُمَّ نُكَرِّرُ مَرَّتَيْنِ؟
فَلَمْ نَطَّلِعْ عَلَى نَصٍّ فِي الْمَسْأَلَةِ يُعَيِّنُ أَحَدَ الْأَمْرَيْنِ، وَلَكِنَّ الظَّاهِرَ أَنَّ الْأَوْلَى أَنْ تَقْرَأَ السُّوَرَ الثَّلَاثَ مَرَّةً ثُمَّ تُعِيدَ قِرَاءَتَهَا مَعَ بَعْضٍ مَرَّتَيْنِ، وَيَدُلُّ لِهَذَا أَنَّهُ ثَبَتَ عَنِ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فِي أَذْكَارِ النَّوْمِ أَنَّهُ كَانَ إِذَا أَوَى إِلَى فِرَاشِهِ كُلَّ لَيْلَةٍ جَمَعَ كَفَّيْهِ ثُمَّ نَفَثَ فِيهِمَا فَقَرَأَ فِيهِمَا: قُلْ هُوَ اللَّهُ أَحَدٌ، وَقُلْ أَعُوذُ بِرَبِّ الْفَلَقِ، وَقُلْ أَعُوذُ بِرَبِّ النَّاسِ، ثُمَّ يَمْسَحُ بِهِمَا مَا اسْتَطَاعَ مِنْ جَسَدِهِ يَبْدَأُ بِهِمَا عَلَى رَأْسِهِ وَوَجْهِهِ، وَمَا أَقْبَلَ مِنْ جَسَدِهِ. يَفْعَلُ ذَلِكَ ثَلَاثَ مَرَّاتٍ. رَوَاهُ الْبُخَارِيُّ
وَثَبَتَ عَنْهُ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ أَنَّهُ قَالَ لِفُقَرَاءِ الْمُهَاجِرِينَ: تُسَبِّحُونَ وَتَحْمَدُونَ وَتُكَبِّرُونَ خَلْفَ كُلِّ صَلَاةٍ ثَلَاثًا وَثَلَاثِينَ. مُتَّفَقٌ عَلَيْهِ.
وَقَالَ أَبُو صَالِحٍ الرَّاوِي عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ لَمَّا سُئِلَ عَنْ كَيْفِيَّةِ ذِكْرِهِنَّ قَالَ: يَقُولُ: سُبْحَانَ اللَّهِ، وَالْحَمْدُ لِلَّهِ، وَاللَّهُ أَكْبَرُ. حَتَّى يَكُونَ مِنْهُنَّ كُلِّهِنَّ ثَلَاثًا وَثَلَاثِينَ، كَذَا فِي الصَّحِيحِ عَنِ ابْنِ صَالِحٍ.
وَقَدْ رَجَّحَ ابْنُ حَجَرٍ أَنَّ كِلَا الْأَمْرَيْنِ حَسَنٌ وَمَالَ إِلَى أَفْضَلِيَّةِ الْإِفْرَادِ، وَذَكَرَ فِي ذَلِكَ حُجَجًا مِنْهَا حَدِيثُ زَيْدِ بْنِ ثَابِتٍ: أُمِرْنَا أَنْ نُسَبِّحَ فِي دُبُرِ كُلِّ صَلَاةٍ ثَلَاثًا وَثَلَاثِينَ، وَنَحْمَدَ ثَلَاثًا وَثَلَاثِينَ، وَنُكَبِّرَ أَرْبَعًا وَثَلَاثِينَ. وَالْحَدِيثُ رَوَاهُ الْحَاكِمُ وَصَحَّحَهُ وَوَافَقَهُ الذَّهَبِيُّ. وَفِي حَدِيثِ مُسْلِمٍ: مَنْ سَبَّحَ فِي دُبُرِ كُلِّ صَلَاةٍ ثَلَاثًا وَثَلَاثِينَ، وَحَمِدَ اللَّهَ ثَلَاثًا وَثَلَاثِينَ، وَكَبَّرَ اللَّهَ ثَلَاثًا وَثَلَاثِينَ، وَقَالَ تَمَامَ الْمِائَةِ: لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ وَحْدَهُ لَا شَرِيكَ لَهُ، لَهُ الْمُلْكُ وَلَهُ الْحَمْدُ وَهُوَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ. غُفِرَتْ خَطَايَاهُ وَإِنْ كَانَتْ مِثْلَ زَبَدِ الْبَحْرِ.
فَحَدِيثُ أَذْكَارِ النَّوْمِ السَّابِقُ فِي الْمُعَوِّذَاتِ ظَاهِرُهُ الْجَمْعُ بَيْنَ السُّوَرِ، وَإِعَادَتُهَا مَجْمُوعَةً ثَلَاثًا، وَأَمَّا أَحَادِيثُ التَّسْبِيحَاتِ فَالظَّاهِرُ أَنَّ الْأَفْضَلَ هُوَ تَفْرِيقُهَا، فَلَوْ أَنَّ الْإِنْسَانَ جَمَعَ أَوْ فَرَّقَ فَالظَّاهِرُ أَنَّ الْكُلَّ لَا حَرَجَ فِيهِ، وَالْأَوْلَى إِلْحَاقُ الْمُعَوِّذَاتِ مَسَاءً وَصَبَاحًا بِالْمُعَوِّذَاتِ فِي أَذْكَارِ النَّوْمِ.
सुबह और शाम के अज़कार में हम सूरा अल-इख़लास और दोनों सुरक्षा की सूराएँ तीन बार पढ़ते हैं।
क्या प्रत्येक सूरा लगातार तीन बार पढ़ें या एक बार अल-इख़लास, फिर एक बार अल-फ़लक़, फिर एक बार अन-नास पढ़ें और फिर इन्हें एक साथ दो बार और दोहराएँ?
इस मामले में हमें ऐसा कोई पाठ नहीं मिला जो दोनों में से एक तरीका निश्चित करता हो। परंतु स्पष्टतः बेहतर यह है कि तीनों सूराएँ एक-एक बार पढ़कर पूरे क्रम को दो बार और दोहराया जाए। इसके समर्थन में सोने से पहले के अज़कार का प्रमाण है: नबी ﷺ हर रात बिस्तर पर जाते समय दोनों हथेलियाँ मिलाते, उनमें फूँकते और उनमें “कह दो: वह अल्लाह एक है”, “कह दो: मैं सुबह के रब की पनाह माँगता हूँ” और “कह दो: मैं लोगों के रब की पनाह माँगता हूँ” पढ़ते। फिर वे हथेलियों को जहाँ तक संभव होता शरीर पर फेरते, शुरुआत सिर, चेहरे और शरीर के अगले भाग से करते। यह वे तीन बार करते। इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है।
यह भी प्रमाणित है कि नबी ﷺ ने निर्धन मुहाजिरों से कहा: “हर नमाज़ के बाद तस्बीह, तहमीद और तक्बीर तैंतीस-तैंतीस बार कहो।” इसे बुख़ारी और मुस्लिम दोनों ने रिवायत किया है।
अबू हुरैरा से रिवायत करने वाले अबू सालिह से जब इन्हें कहने का तरीका पूछा गया तो उन्होंने कहा: “सुब्हानल्लाह, अल्हम्दुलिल्लाह और अल्लाहु अकबर कहता रहे, यहाँ तक कि हर एक तैंतीस बार हो जाए।” सहीह में इब्न सालिह से इसी तरह है।
इब्न हजर ने दोनों तरीकों को अच्छा माना और प्रत्येक को अलग-अलग पढ़ने को बेहतर माना। उन्होंने इसके लिए ज़ैद बिन साबित की हदीस सहित कई तर्क दिए: “हमें हर नमाज़ के बाद तैंतीस बार तस्बीह, तैंतीस बार तहमीद और चौंतीस बार तक्बीर कहने का आदेश दिया गया।” इसे हाकिम ने रिवायत कर सहीह कहा और ज़हबी ने सहमति दी। मुस्लिम की हदीस में है: जो हर नमाज़ के बाद तैंतीस बार तस्बीह, तैंतीस बार अल्लाह की प्रशंसा, तैंतीस बार तक्बीर कहे और सौ पूरा करने के लिए कहे: “अल्लाह के सिवा कोई उपास्य नहीं, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं; राज्य और प्रशंसा उसी के लिए है और वह हर चीज़ पर समर्थ है”, उसके गुनाह माफ़ कर दिए जाएँगे, चाहे वे समुद्र के झाग के बराबर हों।
सोने से पहले सुरक्षा की सूराओं से संबंधित पिछली हदीस में स्पष्टतः तीनों सूराओं को एक साथ पढ़कर पूरा क्रम तीन बार दोहराना है। तस्बीह की हदीसों से प्रत्येक को अलग-अलग पढ़ना बेहतर प्रतीत होता है। कोई साथ पढ़े या अलग-अलग, दोनों में कोई हर्ज नहीं लगता। सुबह और शाम की सुरक्षा वाली सूराओं को सोने से पहले के इसी पाठ के समान मानना अधिक उचित है।
क्या प्रत्येक सूरा लगातार तीन बार पढ़ें या एक बार अल-इख़लास, फिर एक बार अल-फ़लक़, फिर एक बार अन-नास पढ़ें और फिर इन्हें एक साथ दो बार और दोहराएँ?
इस मामले में हमें ऐसा कोई पाठ नहीं मिला जो दोनों में से एक तरीका निश्चित करता हो। परंतु स्पष्टतः बेहतर यह है कि तीनों सूराएँ एक-एक बार पढ़कर पूरे क्रम को दो बार और दोहराया जाए। इसके समर्थन में सोने से पहले के अज़कार का प्रमाण है: नबी ﷺ हर रात बिस्तर पर जाते समय दोनों हथेलियाँ मिलाते, उनमें फूँकते और उनमें “कह दो: वह अल्लाह एक है”, “कह दो: मैं सुबह के रब की पनाह माँगता हूँ” और “कह दो: मैं लोगों के रब की पनाह माँगता हूँ” पढ़ते। फिर वे हथेलियों को जहाँ तक संभव होता शरीर पर फेरते, शुरुआत सिर, चेहरे और शरीर के अगले भाग से करते। यह वे तीन बार करते। इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है।
यह भी प्रमाणित है कि नबी ﷺ ने निर्धन मुहाजिरों से कहा: “हर नमाज़ के बाद तस्बीह, तहमीद और तक्बीर तैंतीस-तैंतीस बार कहो।” इसे बुख़ारी और मुस्लिम दोनों ने रिवायत किया है।
अबू हुरैरा से रिवायत करने वाले अबू सालिह से जब इन्हें कहने का तरीका पूछा गया तो उन्होंने कहा: “सुब्हानल्लाह, अल्हम्दुलिल्लाह और अल्लाहु अकबर कहता रहे, यहाँ तक कि हर एक तैंतीस बार हो जाए।” सहीह में इब्न सालिह से इसी तरह है।
इब्न हजर ने दोनों तरीकों को अच्छा माना और प्रत्येक को अलग-अलग पढ़ने को बेहतर माना। उन्होंने इसके लिए ज़ैद बिन साबित की हदीस सहित कई तर्क दिए: “हमें हर नमाज़ के बाद तैंतीस बार तस्बीह, तैंतीस बार तहमीद और चौंतीस बार तक्बीर कहने का आदेश दिया गया।” इसे हाकिम ने रिवायत कर सहीह कहा और ज़हबी ने सहमति दी। मुस्लिम की हदीस में है: जो हर नमाज़ के बाद तैंतीस बार तस्बीह, तैंतीस बार अल्लाह की प्रशंसा, तैंतीस बार तक्बीर कहे और सौ पूरा करने के लिए कहे: “अल्लाह के सिवा कोई उपास्य नहीं, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं; राज्य और प्रशंसा उसी के लिए है और वह हर चीज़ पर समर्थ है”, उसके गुनाह माफ़ कर दिए जाएँगे, चाहे वे समुद्र के झाग के बराबर हों।
सोने से पहले सुरक्षा की सूराओं से संबंधित पिछली हदीस में स्पष्टतः तीनों सूराओं को एक साथ पढ़कर पूरा क्रम तीन बार दोहराना है। तस्बीह की हदीसों से प्रत्येक को अलग-अलग पढ़ना बेहतर प्रतीत होता है। कोई साथ पढ़े या अलग-अलग, दोनों में कोई हर्ज नहीं लगता। सुबह और शाम की सुरक्षा वाली सूराओं को सोने से पहले के इसी पाठ के समान मानना अधिक उचित है।